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हृदय परिवर्तन - Heart Change

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एक राजा को राज भोगते काफी समय हो गया था। बाल भी सफ़ेद होने लगे थे। एक दिन उसने अपने दरबार में उत्सव रखा और अपने गुरुदेव एवं मित्र देश के राजाओं को भी सादर आमन्त्रित किया। उत्सव को रोचक बनाने के लिए राज्य की सुप्रसिद्ध नर्तकी को भी बुलाया गया। राजा ने कुछ स्वर्ण मुद्रायें अपने गुरु जी को भी दीं, ताकि नर्तकी के अच्छे गीत व नृत्य पर वे उसे पुरस्कृत कर सकें। सारी रात नृत्य चलता रहा। ब्रह्म मुहूर्त की बेला आयी। नर्तकी ने देखा कि मेरा तबले वाला ऊँघ रहा है, उसको जगाने के लिए नर्तकी ने एक दोहा पढ़ा-  "बहु बीती, थोड़ी रही, पल पल गयी बिताई। एक पलक के कारने, ना कलंक लग जाए।।" अब इस दोहे का अलग-अलग व्यक्तियों ने अपने अनुरुप अर्थ निकाला। तबले वाला सतर्क होकर बजाने लगा। जब यह बात गुरु जी ने सुनी। गुरु जी ने सारी मोहरें उस नर्तकी के सामने फैंक दीं। वही दोहा नर्तकी ने फिर पढ़ा तो राजा की लड़की ने अपना नवलखा हार नर्तकी को भेंट कर दिया। उसने फिर वही दोहा दोहराया तो राजा के पुत्र युवराज ने अपना मुकट उतारकर नर्तकी को समर्पित कर दिया। नर्तकी फिर वही दोहा दोहराने लगी तो राजा ने कह...

रक्षा-बंधन पर बहन से वादा - Promise to Sister on Raksha-Bandhan

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सुबह बहन जल्दी उठती है और घर के सारे कामों को खत्म कर अपने भैया को जगाती है। बहन -  भैया उठो ना, जल्दी से उठो ना, आज रक्षाबन्धन  है। आप जल्दी से तैयार हो जाओ, मै सबसे पहले आपको राखी बांधुगी। भाई - ठीक है। भाई तैयार हो जाता है और बहन पूजा की थाली, मिठाई और राखी लेकर आती है बहन -  भैया अपना दाहिना हाथ आगे बढाओ। भाई अपना हाथ आगे करके राखी बंधवा लेता है और जेब से निकालकर उसको एक खूबसूरत घड़ी देता है। ( जो उसने बहन के लिए एक दिन पहले ही खरीदी थी ) लेकिन बहन मना कर देती है फिर भाई अपने पर्स से कुछ पैसे निकाल कर देता है लेकिन बहन फिर वापस कर देती है। तब भाई पुछता है कि बताओ तुम्हे क्या चाहिए ? बहन -  जो मागुंगी वो दोगे ? भाई - हां दुंगा। बहन - पहले मुझसे वादा करो ? भाई - हां मैं पक्का वादा करता हूँ कि जो तू मांगेंगी वो मैं दुंगा। अब बोल तुझे क्या चाहिए ? बहन -  भैया आज रक्षाबन्धन के दिन आप मुझसे ये वादा करो कि आप आज से  मां और बहन की गालियां नहीं दोगे। इतना कहकर उसकी आंखों में आसूं आ जाते हैं। (बहन रोते हुए )...

श्री नागेश्वर ज्योतिर्लिंग - Shree Nageshwar Jyotirling

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गुजरात में द्वारका के पास नागेश्वर शिव के 12 ज्योतिर्लिंग मंदिरों में से एक है। मंदिर में ज्योतिर्लिंग को नागेश्वर महादेव के नाम से जाना जाता है। मंदिर में स्थित ज्योतिर्लिंग को सभी प्रकार के जहरों से रक्षा करना माना जाता है। यह माना जाता है कि जो मंदिर में प्रार्थना करता है वह जहरीला मुक्त होता है। इस पवित्र ज्योतिर्लिंग के दर्शन की शास्त्रों में बड़ी महिमा बताई गई है। कहा गया है कि जो श्रद्धापूर्वक इसकी उत्पत्ति और माहात्म्य की कथा सुनेगा वह सारे पापों से छुटकारा पाकर समस्त सुखों का भोग करता हुआ अंत में भगवान्‌ शिव के परम पवित्र दिव्य धाम को प्राप्त होगा। भगवान्‌ शिव का यह प्रसिद्ध ज्योतिर्लिंग गुजरात प्रांत में द्वारकापुरी से लगभग 17 मील की दूरी पर स्थित है। हर साल हजारों तीर्थयात्रियों द्वारा मंदिर का दौरा किया जाता है। यह मंदिर गुजरात में द्वारका और द्वारका द्वीप सूरत के तट पर स्थित है। किंवदंतियों के अनुसार, सुप्रिय नामक एक भक्त को एक नाव में दानूक नामक दानव ने हमला किया था। श्री नागेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर के बारे में - दिवंगत गुलशन कुमार द्वारा वर्तमान मंदिर का पुन...

नमक का स्वाद - Taste of Salt (Shri Krishna and Satyabhama)

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एक बार सत्यभामा ने श्रीकृष्ण से पूछा - मैं आप को कैसी लगती हूँ ? श्रीकृष्ण ने कहा तुम मुझे नमक जैसी लगती हो। सत्यभामा इस तुलना को सुन कर क्रुद्ध हो गयी, तुलना भी की तो किस से, आपको इस संपूर्ण विश्व में मेरी तुलना करने के लिए और कोई पदार्थ नहीं मिला। श्रीकृष्ण ने उस वक़्त तो किसी तरह सत्यभामा को मना लिया और उनका गुस्सा शांत कर दिया। कुछ दिन पश्चात श्रीकृष्ण ने अपने महल में एक भोज का आयोजन किया। छप्पन भोग की व्यवस्था हुई। श्रीकृष्ण ने सर्वप्रथम आठों पटरानियों को, जिनमें पाकशास्त्र में निपुण सत्यभामा भी थी, से भोजन प्रारम्भ करने का आग्रह किया। सत्यभामा ने पहला कौर मुँह में डाला मगर यह क्या.. सब्जी में नमक ही नहीं था। सत्यभामा ने उस कौर को मुँह से निकाल दिया। फिर दूसरा कौर मावा-मिश्री का मुँह में डाला और फिर उसे चबाते-चबाते बुरा सा मुँह बनाया और फिर पानी की सहायता से किसी तरह मुँह से उतारा। अब तीसरा कौर फिर कचौरी का मुँह में डाला और फिर.. आक्..थू ! तब तक सत्यभामा का पारा सातवें आसमान पर पहुँच चुका था। जोर से चीखीं.. किसने बनाई है यह रसोइ ? सत्यभामा की आवाज सुन कर श्रीकृष्ण दौड़ते ह...

नदी और दोस्त - River and Friend (A Motivational Story)

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एक गांव में दो दोस्त रहते थे। एक बार उन्होंने शहर जाकर कुछ काम करने का फैसला किया और शहर के लिए निकल पड़े। गांव के अंत में एक जमी हुई नदी थी। शहर जाने के लिए उन्हें वह नदी पार करनी ही थी। वहां कोई पुल भी नहीं था।  ऐसे में एक दोस्त ने कहा कि नदी पार करना खतरनाक है, इसलिए बेहतर है कि गांव में ही रहें। हालांकि, दूसरा दोस्त कुछ और ही सोच रहा था। उसने मन में निश्चय कर लिया था कि वह किसी भी कीमत पर शहर जाकर ही रहेगा।  अपने इस दृढ़-निश्चय के साथ वह जमी हुई नदी पर आगे बढ़ने लगा। उसका दोस्त किनारे पर खड़ा होकर उसे ऐसा करने से रोक रहा था। वह चिल्ला रहा था कि तुम गिर जाओगे। कुछ कदम चलने के बाद वह लड़का जमी हुई नदी पर फिसल गया।  किनारे खड़े दोस्त ने उसे लौटने के लिए कहा लेकिन वह फिर से खड़ा हुआ और आगे बढ़ने लगा। सावधानी से आगे बढ़ते हुए उसने आखिरकार नदी पार कर ली और शहर की ओर बढ़ गया। वहीं, उसके दोस्त ने नदी पार करने की कोशिश ही नहीं की और वहीं राह गया। मंत्र: अगर आप कुछ ठान लें तो अवश्य ही उसे हासिल कर सकते हैं।

एक बेटा और वृद्ध पिता - A Son and Old Father (A Moral Story)

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एक बेटा अपने वृद्ध पिता को रात्रि भोज के लिए एक अच्छे रेस्टॉरेंट में लेकर गया। खाने के दौरान वृद्ध पिता ने कई बार भोजन अपने कपड़ों पर गिराया। रेस्टॉरेंट में बैठे खाना खा रहे दूसरे लोग वृद्ध को घृणा की नजरों से देख रहे थे, लेकिन वृद्ध का बेटा शांत था। खाने के बाद बिना किसी शर्म के बेटा, वृद्ध को वॉश रूम ले गया। उनके कपड़े साफ़ किये, उनका चेहरा साफ़ किया, उनके बालों में कंघी की,चश्मा पहनाया और फिर बाहर लाया। सभी लोग खामोशी से उन्हें ही देख रहे थे। बेटे ने बिल का भुगतान किया और वृद्ध के साथ बाहर जाने लगा। तभी डिनर कर रहे एक अन्य वृद्ध ने बेटे को आवाज दी और उससे पूछा "क्या तुम्हे नहीं लगता कि यहाँ अपने पीछे तुम कुछ छोड़ कर जा रहे हो ?" बेटे ने जवाब दिया "नहीं सर, मैं कुछ भी छोड़ कर नहीं जा रहा।" वृद्ध ने कहा "बेटे, तुम यहाँ छोड़ कर जा रहे हो, प्रत्येक पुत्र के लिए एक शिक्षा (सबक) और प्रत्येक पिता के लिए उम्मीद (आशा)।" आमतौर पर हम लोग अपने बुजुर्ग माता पिता को अपने साथ बाहर ले जाना पसंद नहीँ करते और कहते हैं क्या करोगे आप? आप से चला तो जाता नह...

धर्म और मुक्ति - Religion and Liberation

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शिप्रा नदी के पास बसे एक गांव से एक पंडित रोज नदी को पार कर उज्जैन शहर मे रहने वाले एक धनी सेठ को कथा सुनाने जाता था। पंडित रोज सेठ को कथा सुनाता और बदले में सेठ उसे धन दान देता। ऐसे ही एक दिन जब वह पण्डित सेठ को कथा सुनाने के लिये नदी को पार करके जा रहा था तो उसे एक आवाज सुनाई दी - "कभी हमें भी ज्ञान दे दिया करो।" पण्डित ने इधर-उधर देखा मगर उसे वहां कोई दिखाई नही दिया। उसे फिर अपने पास से ही एक आवाज सुनाई दी - "पण्डित जी मैं यहाँ हूँ।" पण्डित ने देखा कि वह एक घड़ियाल था। पण्डित जी हैरान भी थे घड़ियाल को इंसान की आवाज में बोलते सुनकर और घबराये भी थे। घड़ियाल ने कहा - "पण्डित जी आप डरिये नही आप मुझे कथा सुनाकर ज्ञान प्रदान करे और यह सब मैं मुफ्त में भी नही मांग रहा हूँ। आपकी कथा के बदले में रोज आपको एक अशर्फी मैं दिया करूंगा।" पण्डित को बात जची। पण्डित को तो धन की चाहत थी फिर चाहे वो उसे नदी के उस पार सेठ को कथा सुनाने से मिले या नदी के इस किनारे घड़ियाल को कथा सुनाकर मिले। रोज वह पण्डित घड़ियाल को कथा सुनाता और रोज घड़ियाल पण्डित को एक अशर्फी बदल...

आम का पेड़ - The Tree of Mango (A Heart Touching Story)

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एक बच्चे को आम का पेड़ बहुत पसंद था। जब भी फुर्सत मिलती वो आम के पेड के पास पहुच जाता। पेड के उपर चढ़ता, आम खाता, खेलता और थक जाने पर उसी की छाया मे सो जाता। उस बच्चे और आम के पेड के बीच एक अनोखा रिश्ता बन गया। बच्चा जैसे-जैसे बडा होता गया वैसे-वैसे उसने पेड के पास आना कम कर दिया। कुछ समय बाद तो बिल्कुल ही बंद हो गया। आम का पेड उस बालक को याद करके अकेला रोता। एक दिन अचानक पेड ने उस बच्चे को अपनी तरफ आते देखा और पास आने पर कहा- "तू कहां चला गया था? मै रोज तुम्हे याद किया करता था। चलो आज फिर से दोनो खेलते है।" बच्चे ने आम के पेड से कहा- "अब मेरी खेलने की उम्र नही है। मुझे पढना है, लेकिन मेरे पास फीस भरने के पैसे नही है।" पेड ने कहा- "तू मेरे आम लेकर बाजार मे बेच दे। इससे जो पैसे मिले उससे अपनी फीस भर देना।" उस बच्चे ने आम के पेड से सारे आम तोड़ लिए और उन सब आमो को लेकर वहा से चला गया। उसके बाद फिर कभी दिखाई नही दिया। आम का पेड उसकी राह देखता रहता। एक दिन वो फिर आया और कहने लगा- "अब मुझे नौकरी मिल गई है, मेरी शादी भी हो चुकी है, मुझे मेरा अपना ...

वृंदावन की एक गोपी - A Gopi of Vrindavan (प्रभु नाम में पूर्ण विश्वास एंव श्रद्धा)

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वृंदावन की एक गोपी रोज दूध दही बेचने मथुरा जाती थी। एक दिन ब्रज में एक संत आये, गोपी भी कथा सुनने गई। संत कथा में कह रहे थे- "भगवान के नाम की बड़ी महिमा है, उनके नाम से बड़े बड़े संकट भी टल जाते है। प्रभु का नाम तो भव सागर से तारने वाला है। यदि भव सागर से पार होना है तो भगवान का नाम कभी मत छोडना।" कथा समाप्त हुई गोपी अगले दिन फिर दूध दही बेचने चली। बीच में यमुना जी थी। गोपी को संत की बात याद आई, संत ने कहा था भगवान का नाम तो भवसागर से पार लगाने वाला है। गोपी ने सोचा, जिस भगवान का नाम भव सागर से पार लगा सकता है तो क्या उन्ही भगवान का नाम मुझे इस साधारण सी नदी से पार नहीं लगा सकता ? ऐसा सोचकर गोपी ने मन में भगवान के नाम का आश्रय लिया और भोली भाली गोपी यमुना जी की ओर आगे बढ़ गई। अब जैसे ही यमुना जी में पैर रखा तो लगा मानो जमीन पर चल रही है और ऐसे ही सारी नदी पार कर गई। पार पहुँचकर बड़ी प्रसन्न हुई और मन में सोचने लगी कि संत ने तो ये बड़ा अच्छा तरीका बताया पार जाने का। रोज-रोज नाविक को भी पैसे नहीं देने पड़ेगे। एक दिन गोपी ने सोचा कि संत ने मेरा इतना भला किया म...

चटोरे मदनमोहन - Chatore Madan Mohan (A Religious Story)

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सनातन गोस्वामी जी मथुरा में एक चौबे के घर मधुकरी के लिए जाया करते थे। उस चौबे की स्त्री परमभक्त और मदन मोहन जी की उपासिका थी, उसके घर बाल भाव से मदन मोहन भगवान विराजते थे। असल में सनातन जी उन्ही मदन मोहन जी के दर्शन हेतु प्रतिदिन मधुकरी के बहाने जाया करते थे। मदन मोहन जी तो ग्वार ग्वाले ही ठहरे ये आचार विचार क्या जाने, उस चौबे के लड़के के साथ ही एक पात्र में भोजन करते थे। ये देख सनातन जी को बड़ा आश्चर्य हुआ, ये मदनमोहन तो बड़े वचित्र है। एक दिन इन्होने आग्रह करके मदन मोहन जी का उच्छिष्ठ (झूठा) अन्न मधुकरी में माँगा। चौबे की स्त्री ने भी स्वीकार करके दे दिया, बस फिर क्या था। इन्हे उस माखन चोर की लपलपाती जीभ से लगे हुए अन्न का चश्का लग गया, ये नित्य उसी अन्न को लेने जाने लगे। एक दिन मदन मोहन ने इन्हे स्वप्न में दर्शन देकर कहा, बाबा तुम रोज इतनी दूर से आते हो, और इस मथुरा शहर में भी हमे ऊब सी मालूम होवे है। तुम उस चौबे से हमको मांग के ले आओ हमको भी तुम्हारे साथ जंगल में रहनो है।  ठीक उसी रात को चौबे को भी यही स्वप्न हुआ की हमको आप सनातन बाबा को दान कर दो...

सातवां घड़ा - Seventh Pitcher (A Moral Story)

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एक गाँव में एक नाई अपनी पत्नी और बच्चों के साथ रहता था। नाई ईमानदार था, अपनी कमाई से संतुष्ट था। उसे किसी तरह का लालच नहीं था। नाई की पत्नी भी अपनी पति की कमाई हुई आय से बड़ी कुशलता से अपनी गृहस्थी चलाती थी। कुल मिलाकर उनकी जिंदगी बड़े आराम से हंसी-खुशी से गुजर रही थी। नाई अपने काम में बहुत निपुण था। एक दिन वहाँ के राजा ने नाई को अपने पास बुलवाया और रोज उसे महल में आकर हजामत बनाने को कहा। नाई ने भी बड़ी प्रसन्नता से राजा का प्रस्ताव मान लिया। नाई को रोज राजा की हजामत बनाने के लिए एक स्वर्ण मुद्रा मिलती थी।  इतना सारा पैसा पाकर नाई की पत्नी भी बड़ी खुश हुई। अब उसकी जिन्दगी बड़े आराम से कटने लगी। घर पर किसी चीज की कमी नहीं रही और हर महीने अच्छी रकम की बचत भी होने लगी। नाई, उसकी पत्नी और बच्चे सभी खुश रहने लगे। एक दिन शाम को जब नाई अपना काम निपटा कर महल से अपने घर वापस जा रहा था, तो रास्ते में उसे एक आवाज सुनाई दी। आवाज एक यक्ष की थी। यक्ष ने नाई से कहा, ‘‘मैंने तुम्हारी ईमानदारी के बड़े चर्चे सुने हैं, मैं तुम्हारी ईमानदारी से बहुत खुश हूँ और तुम्हें सोने क...

शर्मा जी और केले बेचने वाली बुढ़िया - Sharma Ji and Banana Sellers Old Lady (मोल भाव)

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ऑफिस से निकल कर शर्मा जी ने स्कूटर स्टार्ट किया ही था कि उन्हें याद आया, पत्नी ने कहा था 1 दर्ज़न केले लेते आना।  तभी उन्हें सड़क किनारे बड़े और ताज़ा केले बेचते हुए एक बीमार सी दिखने वाली बुढ़िया दिख गयी। वैसे तो शर्मा जी फल हमेशा "राम आसरे फ्रूट भण्डार" से ही लेते थे, पर आज उन्हें लगा कि क्यों न बुढ़िया से ही खरीद लूँ ?  उन्होंने बुढ़िया से पूछा- "माई, केले कैसे दिए।" बुढ़िया बोली- बाबूजी 20 रूपये दर्जन। शर्मा जी बोले- माई 15 रूपये दूंगा। बुढ़िया ने कहा- 18 रूपये दे देना, दो पैसे मै भी कमा लूंगी।  शर्मा जी बोले- 15 रूपये लेने हैं तो बोल। बुझे चेहरे से बुढ़िया ने "न" मे गर्दन हिला दिया। शर्मा जी बिना कुछ कहे चल पड़े और राम आसरे फ्रूट भण्डार पर आकर केले का भाव पूछा तो वह बोला 28 रूपये दर्जन हैं। बाबूजी, कितने दर्जन दूँ ? शर्मा जी बोले- 5 साल से फल तुमसे ही ले रहा हूँ, ठीक भाव लगाओ। तो फलवाले ने सामने लगे बोर्ड की ओर इशारा कर दिया। बोर्ड पर लिखा था- "मोल भाव करने वाले माफ़ करें।" शर्माजी को उसका यह व्यवहार बहुत बुरा लगा, उ...

संत और कसाई का तोता - Parrot of the Sage and Butcher (संगति का असर)

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एक राजा ने एक तोता पाल रखा था। एक दिन वह तोता मर गया। राजा ने मंत्री को कहा- "मंत्रीवर, हमारा तोते का पिंजरा सूना हो गया है। इसमें पालने के लिए एक तोता लाओ। अब, तोते सदैव तो मिलते नहीं। लेकिन राजा पीछे पड़ गये तो मंत्री एक संत के पास गये और कहा- "भगवन्, राजा साहब एक तोता लाने की जिद कर रहे हैं। आप अपना तोता दे दें तो बड़ी कृपा होगी।" संत ने कहा- "ठीक है, ले जाओ।" राजा ने सोने के पिंजरे में बड़े स्नेह से तोते की सुख-सुविधा का प्रबन्ध किया। ब्रह्म मुहूर्त होते ही तोता बोलने लगता- "ओम् तत्सत्... ओम् तत्सत्... उठो राजा! उठो महारानी! दुर्लभ मानव-तन मिला है। यह सोने के लिए नहीं, भजन करने के लिए मिला है।" चित्रकूट के घाट पर, भई संतन की भीर । तुलसीदास चंदन घिसै, तिलक देत रघुबीर ।। कभी रामायण की चौपाई, तो कभी गीता के श्लोक तोते के मुँह से निकलते। पूरा राजपरिवार बड़े सवेरे उठकर उसकी बातें सुना करता था। राजा कहते थे कि सुग्गा क्या मिला, एक संत मिल गये। हर जीव की एक निश्चित आयु होती है। एक दिन वह सुग्गा मर गया। राजा, रानी, राजपरिवार और पूरे राष्ट्र ने हफ़...

श्री माधवेन्द्र पुरीपाद जी के जीवन की एक सत्य घटना - A Real Incident of Shri Madhvendra Puripad Ji

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एक बार श्री माधवेन्द्र पुरीपाद जी अपने श्री गोवर्धनधारी गोपाल के लिए चन्दन लेने पूर्व देश की ओर गए। चलते - चलते वह ओड़िसा के रेमुणा नामक स्थान पर पहुंचे। वहां पर श्री गोपीनाथ जी के दर्शन कर वह बहुत प्रसन्न हुए। कुछ ही समय में ''अमृतकेलि'' नामक खीर का भोग श्री गोपीनाथ जी को लगाया गया। तब उनके मन में विचार आया कि बिना मांगे ही इस खीर का प्रसाद मिल जाता तो मैं उसका आस्वादन करके, ठीक उसी प्रकार का भोग अपने गोपाल जी को लगाता किन्तु साथ ही साथ अपने आपको धिक्कार दिया कि मेरी खीर खाने की इच्छा हुई। ठाकुर जी की आरती दर्शन करके और उन्हें प्रणाम करके वह मंदिर से चले गये व एक निर्जन स्थान पर बैठ कर हरिनाम का जाप करने लगे। इधर मंदिर के पुजारी ठाकुर गोपीनाथ जी की सेवा कार्य समाप्त कर सो गए। उसे स्वप्न में ठाकुर जी ने दर्शन दिये व कहा- ''पुजारी उठो ! मंदिर के दरवाज़े खोलो। मैंने एक संन्यासी के लिये खीर रखी हुई है जो कि मेरे आंचल के कपड़े से ढकी हुई है। मेरी माया के कारण तुम उसे नहीं जान पाये। माधवेन्द्र पुरी नाम के संन्यासी कुछ ही दूर एक निर्जन स्थान पर...

कृष्ण और सुदामा का अटूट प्रेम - The Friend Love of Krishna And Sudama

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कृष्ण और सुदामा का प्रेम बहुत गहरा था। प्रेम भी इतना कि कृष्ण, सुदामा को रात दिन अपने साथ ही रखते थे। कोई भी काम होता, दोनों साथ-साथ ही करते। एक दिन दोनों वनसंचार के लिए गए और रास्ता भटक गए। भूखे-प्यासे एक पेड़ के नीचे पहुंचे। पेड़ पर एक ही फल लगा था। कृष्ण ने घोड़े पर चढ़कर फल को अपने हाथ से तोड़ा। कृष्ण ने फल के छह टुकड़े किए और अपनी आदत के मुताबिक पहला टुकड़ा सुदामा को दिया। सुदामा ने टुकड़ा खाया और बोला, "बहुत स्वादिष्ट! ऎसा फल कभी नहीं खाया। एक टुकड़ा और दे दो। दूसरा टुकड़ा भी सुदामा को मिल गया। सुदामा ने एक टुकड़ा और कृष्ण से मांग लिया। इसी तरह सुदामा ने पांच टुकड़े मांग कर खा लिए। जब सुदामा ने आखिरी टुकड़ा मांगा, तो कृष्ण ने कहा, "यह सीमा से बाहर है, मित्र। आखिर मैं भी तो भूखा हूं। मेरा तुम पर प्रेम है, पर तुम मुझसे प्रेम नहीं करते।" और कृष्ण ने फल का टुकड़ा मुंह में रख लिया। मुंह में रखते ही कृष्ण ने उसे थूक दिया, क्योंकि वह कड़वा था। कृष्ण बोले, "तुम पागल तो नहीं, इतना कड़वा फल कैसे खा गए?"  उस सुदामा का उत्तर था- "जिन हाथों से बहुत म...

सुदामा जी को गरीबी क्यों मिली? - Why Did Sudama Get Poverty?

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अगर अध्यात्मिक दृष्टिकोण से देखा जाये तो सुदामा जी बहुत धनवान थे। जितना धन उनके पास था, उतना धन किसी के पास नहीं था, पर भौतिक दृष्टि से वह बहुत निर्धन थे। आखिर क्यों, सुदामा जी को गरीबी मिली ? एक ब्राह्मणी थी जो बहुत गरीब निर्धन थी। भिक्षा माँग कर जीवन यापन करती थी। एक समय ऐसा आया कि पाँच दिन तक उसे भिक्षा नहीं मिली तो वह प्रतिदिन पानी पीकर भगवान का नाम लेकर सो जाती थी। छठवें दिन उसे भिक्षा में दो मुट्ठी चना मिले। कुटिया तक पहुँचते-पहुँचते रात हो गयी। ब्राह्मणी ने सोचा, अब ये चने रात में नही खाऊँगी। प्रात:काल वासुदेव को भोग लगाऊंगी तब खाऊँगी। यह सोचकर ब्राह्मणी ने चनों को कपड़े में बाँधकर रख दिया और वासुदेव का नाम जपते-जपते सो गयी। समय का खेल देखिए कहते हैं "पुरुष बली नहीं होत है समय होत बलवान"। ब्राह्मणी के सोने के बाद कुछ चोर चोरी करने के लिए उसकी कुटिया में आ गये। इधर-उधर ढूँढने पर चोरों को वह चनों की बँधी पोटली मिल गयी चोरों ने समझा इसमें सोने के सिक्के हैं। इतने में ब्राह्मणी जाग गयी और शोर मचाने लगी। गाँव के सारे लोग चोरों को पकड़ने के लिए दौड़े। पकड़े जाने ...

भगवान श्री जगन्नाथ जी को भेंट - Donation to Lord Shri Jagannath Ji

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बहुत पुरानी बात है, एक सेठ के पास एक व्यक्ति काम करता था। सेठ उस व्यक्ति पर बहुत विश्वास करता था जो भी जरुरी काम हो वह सेठ हमेशा उसी व्यक्ति से कहता था। वो व्यक्ति भगवान का बहुत बड़ा भक्त था। वह सदा भगवान के चिंतन भजन कीर्तन स्मरण सत्संग आदि का लाभ लेता रहता था। एक दिन उस भक्त ने सेठ से श्री जगन्नाथ धाम यात्रा करने के लिए कुछ दिन की छुट्टी मांगी सेठ ने उसे छुट्टी देते हुए कहा- "भाई मैं तो हूँ संसारी आदमी, हमेशा व्यापार के काम में व्यस्त रहता हूँ जिसके कारण कभी तीर्थ गमन का लाभ नहीं ले पाता। तुम जा ही रहे हो तो यह लो 100 रुपए मेरी ओर से श्री जगन्नाथ प्रभु के चरणों में समर्पित कर देना।" भक्त सेठ से सौ रुपए लेकर श्री जगन्नाथ धाम यात्रा पर निकल गया। कई दिन की पैदल यात्रा करने के बाद वह श्री जगन्नाथ पुरी पहुंचा। मंदिर की ओर प्रस्थान करते समय उसने रास्ते में देखा कि बहुत सारे संत, भक्त जन, वैष्णव जन, हरि नाम संकीर्तन बड़ी मस्ती में कर रहे हैं। सभी की आंखों से अश्रु धारा बह रही है। जोर-जोर से हरि बोल, हरि बोल गूंज रहा है। संकीर्तन में बहुत आनंद आ रहा था। भक्त भी वहीं रुक कर ह...

आखिर क्यों हुआ भगवान श्री कृष्ण और शिव जी का भयंकर युद्ध - Shri Krishna and Shiva Ji Frightful War

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दानवीर दैत्यराज बलि के सौ प्रतापी पुत्र थे। उनमें सबसे बड़ा वाणासुर था। वाणासुर ने भगवान शंकर की बड़ी कठिन तपस्या की। शंकर जी ने उसके तप से प्रसन्न होकर उसे सहस्त्र बाहु तथा अपार बल दे दिया। उसके सहस्त्र बाहु और अपार बल के भय से कोई भी उससे युद्ध नहीं करता था। इसी कारण से वाणासुर अति अहंकारी हो गया।  बहुत काल व्यतीत हो जाने के पश्चात् भी जब उससे किसी ने युद्ध नहीं किया तो वह एक दिन शंकर भगवान के पास आकर बोला, "हे चराचर जगत के ईश्वर! मुझे युद्ध करने की प्रबल इच्छा हो रही है किन्तु कोई भी मुझसे युद्ध नहीं करता। अतः कृपा करके आप ही मुझसे युद्ध करिये।" उसकी अहंकारपूर्ण बात को सुन कर भगवान शंकर को क्रोध आया किन्तु वाणासुर उनका परम भक्त था इसलिये अपने क्रोध का शमन कर उन्होंने कहा, "रे मूर्ख! तुझसे युद्ध करके तेरे अहंकार को चूर-चूर करने वाला उत्पन्न हो चुका है। जब तेरे महल की ध्वजा गिर जावे तभी समझ लेना कि तेरा शत्रु आ चुका है।" वाणासुर की उषा नाम की एक कन्या थी। एक बार उषा ने स्वप्न में श्री कृष्ण के पौत्र तथा प्रद्युम्न के पुत्र अनिरुद्ध को देखा और उस पर मोह...

भगवान विष्णु और माँ लक्ष्मी - Lord Vishnu And Maa Laxmi (प्रभु की कृपा)

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एक बार भगवान विष्णु जी शेषनाग पर बैठे बैठे बोर हो गये तो उन्होने धरती पर घुमने का विचार मन में किया। वैसे भी कई साल बीत गये थे धरती पर आये और वह अपनी यात्रा की तैयारी में लग गये। स्वामी को तैयार होता देख कर लक्ष्मी मां ने पुछा- "आज सुबह सुबह कहा जाने की तैयारी हो रही है?" विष्णु जी ने कहा- "हे लक्ष्मी, मैं धरती लोक पर घुमने जा रहा हूँ।"  कुछ सोच कर लक्ष्मी मां ने कहा- "हे देव, क्या मैं भी आप के साथ चल सकती हूँ?" भगवान विष्णु ने दो पल सोचा फ़िर कहा- "एक शर्त पर, तुम मेरे साथ चल सकती हो। तुम धरती पर पहुंच कर उत्तर दिशा की ओर बिलकुल मत देखना।" इस के साथ ही माता लक्ष्मी ने हाँ कह कर अपनी बात मनवाली।  सुबह सुबह मां लक्ष्मी और भगवान विष्णु धरती पर पहुच गये। अभी सुर्य देवता निकल रहे थे, रात बरसात हो कर हटी थी। चारो ओर हरियाली ही हरियाली थी। उस समय चारो ओर बहुत शान्ति थी और धरती बहुत ही सुन्दर दिख रही थी। मां लक्ष्मी मन्त्र मुग्ध हो कर धरती को देख रही थी और भुल गई कि पति को क्या वचन दे कर आई है? चारों ओर देखती हुयी कब उत्तर दिशा की ...

भगवान नारायण और शिव शंकर - Lord Vishnu And Shiv Shankar (दो शरीर एक आत्मा)

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एक बार भगवान नारायण वैकुण्ठ लोक में सोये हुए थे। उन्होंने स्वप्न में देखा कि करोड़ों चन्द्रमाओं की कांतिवाले, त्रिशूल-डमरू-धारी, स्वर्णाभरण-भूषित, सुरेन्द्र-वन्दित, सिद्धिसेवित त्रिलोचन भगवान शिव प्रेम और आनन्दातिरेक से उन्मत्त होकर उनके सामने नृत्य कर रहे हैं। उन्हें देखकर भगवान विष्णु हर्ष से गद्गद् हो उठे और अचानक उठकर बैठ गये, कुछ देर तक ध्यानस्थ बैठे रहे।  उन्हें इस प्रकार बैठे देखकर श्रीलक्ष्मी जी पूछने लगीं, "भगवन! आपके इस प्रकार अचानक निद्रा से उठकर बैठने का क्या कारण है?" भगवान ने कुछ देर तक उनके इस प्रश्न का कोई उत्तर नहीं दिया और आनंद में मग्न हुए चुपचाप बैठे रहे, कुछ देर बाद हर्षित होते हुए बोले- "देवी, मैंने अभी स्वप्न में भगवान श्री महेश्वर का दर्शन किया है। उनकी छवि ऐसी अपूर्व आनंदमय एवं मनोहर थी कि देखते ही बनती थी। मालूम होता है, शंकर ने मुझे स्मरण किया है। अहोभाग्य, चलो, कैलाश में चलकर हम लोग महादेव के दर्शन करें।" ऐसा विचार कर दोनों कैलाश की ओर चल दिये। भगवान शिव के दर्शन के लिए कैलाश मार्ग पर आधी दूर गये होंगे कि देखते है...