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भजन: श्री गोवर्धन महाराज तेरे माथे मुकुट विराज रहेओ - Shri Govardhan Maharaj Tere Maathe Mukut Viraj Raheo

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श्री गोवर्धन महाराज, ओ महाराज, तेरे माथे मुकुट विराज रहेओ । तोपे पान चढ़े तोपे फूल चढ़े, तोपे चढ़े दूध की धार, ओ धार । तेरे माथे मुकुट... तेरी सात कोस की परिकम्मा, चकलेश्वर है विश्राम, ओ विश्राम । तेरे माथे मुकुट... तेरे गले में कंठा साज रेहेओ, ठोड़ी पे हीरा लाल, ओ लाल । तेरे माथे मुकुट... तेरे कानन कुंडल चमक रहेओ, तेरी झांकी बनी विशाल, ओ विशाल । तेरे माथे मुकुट... ।। गिरिराज धारण प्रभु तेरी शरण ।। Shree govardhan maharaj, o maharaj, tere maathe mukut viraj raheo. tope paan chadhe tope phool chadhe, tope chadhe doodh ki dhaar, o dhaar. tere maathe mukut... teri saat kos ki parikamma, chakaleshvar hai vishram, o vishram. tere maathe mukut... tere gale mein kantha saaj reheo, thodee pe heera laal, o laal. tere maathe mukut... tere kanan kundal chamak raheo, teri jhanki bani vishal, o vishal . tere maathe mukut... ।।  Giriraj Dharan Prabhu Teri Sharan ।।

नमक का स्वाद - Taste of Salt (Shri Krishna and Satyabhama)

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एक बार सत्यभामा ने श्रीकृष्ण से पूछा - मैं आप को कैसी लगती हूँ ? श्रीकृष्ण ने कहा तुम मुझे नमक जैसी लगती हो। सत्यभामा इस तुलना को सुन कर क्रुद्ध हो गयी, तुलना भी की तो किस से, आपको इस संपूर्ण विश्व में मेरी तुलना करने के लिए और कोई पदार्थ नहीं मिला। श्रीकृष्ण ने उस वक़्त तो किसी तरह सत्यभामा को मना लिया और उनका गुस्सा शांत कर दिया। कुछ दिन पश्चात श्रीकृष्ण ने अपने महल में एक भोज का आयोजन किया। छप्पन भोग की व्यवस्था हुई। श्रीकृष्ण ने सर्वप्रथम आठों पटरानियों को, जिनमें पाकशास्त्र में निपुण सत्यभामा भी थी, से भोजन प्रारम्भ करने का आग्रह किया। सत्यभामा ने पहला कौर मुँह में डाला मगर यह क्या.. सब्जी में नमक ही नहीं था। सत्यभामा ने उस कौर को मुँह से निकाल दिया। फिर दूसरा कौर मावा-मिश्री का मुँह में डाला और फिर उसे चबाते-चबाते बुरा सा मुँह बनाया और फिर पानी की सहायता से किसी तरह मुँह से उतारा। अब तीसरा कौर फिर कचौरी का मुँह में डाला और फिर.. आक्..थू ! तब तक सत्यभामा का पारा सातवें आसमान पर पहुँच चुका था। जोर से चीखीं.. किसने बनाई है यह रसोइ ? सत्यभामा की आवाज सुन कर श्रीकृष्ण दौड़ते ह...

वृंदावन की एक गोपी - A Gopi of Vrindavan (प्रभु नाम में पूर्ण विश्वास एंव श्रद्धा)

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वृंदावन की एक गोपी रोज दूध दही बेचने मथुरा जाती थी। एक दिन ब्रज में एक संत आये, गोपी भी कथा सुनने गई। संत कथा में कह रहे थे- "भगवान के नाम की बड़ी महिमा है, उनके नाम से बड़े बड़े संकट भी टल जाते है। प्रभु का नाम तो भव सागर से तारने वाला है। यदि भव सागर से पार होना है तो भगवान का नाम कभी मत छोडना।" कथा समाप्त हुई गोपी अगले दिन फिर दूध दही बेचने चली। बीच में यमुना जी थी। गोपी को संत की बात याद आई, संत ने कहा था भगवान का नाम तो भवसागर से पार लगाने वाला है। गोपी ने सोचा, जिस भगवान का नाम भव सागर से पार लगा सकता है तो क्या उन्ही भगवान का नाम मुझे इस साधारण सी नदी से पार नहीं लगा सकता ? ऐसा सोचकर गोपी ने मन में भगवान के नाम का आश्रय लिया और भोली भाली गोपी यमुना जी की ओर आगे बढ़ गई। अब जैसे ही यमुना जी में पैर रखा तो लगा मानो जमीन पर चल रही है और ऐसे ही सारी नदी पार कर गई। पार पहुँचकर बड़ी प्रसन्न हुई और मन में सोचने लगी कि संत ने तो ये बड़ा अच्छा तरीका बताया पार जाने का। रोज-रोज नाविक को भी पैसे नहीं देने पड़ेगे। एक दिन गोपी ने सोचा कि संत ने मेरा इतना भला किया म...

भगवान श्रीकृष्ण के बारे में दिलचस्प जानकारी - Interesting Information about Lord Shri Krishna

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भगवान् श्री कृष्ण को अलग अलग स्थानों में अलग अलग नामो से जाना जाता है। उत्तर प्रदेश में कृष्ण या गोपाल गोविन्द इत्यादि नामो से जानते है। राजस्थान में श्रीनाथजी या ठाकुरजी के नाम से जानते है। महाराष्ट्र में बिट्ठल के नाम से भगवान् जाने जाते है। उड़ीसा में जगन्नाथ के नाम से जाने जाते है। बंगाल में गोपालजी के नाम से जाने जाते है। दक्षिण भारत में वेंकटेश या गोविंदा के नाम से जाने जाते है। गुजरात में द्वारिकाधीश के नाम से जाने जाते है। असम, त्रिपुरा, नेपाल इत्यादि पूर्वोत्तर क्षेत्रो में कृष्ण नाम से ही पूजा होती है। मलेशिया, इंडोनेशिया, अमेरिका, इंग्लैंड, फ़्रांस इत्यादि देशो में कृष्ण नाम ही विख्यात है। गोविन्द या गोपाल में "गो" शब्द का अर्थ गाय एवं इन्द्रियों, दोनों से है। गो एक संस्कृत शब्द है और ऋग्वेद में गो का अर्थ होता है मनुष्य की इंद्रिया, जो इन्द्रियों का विजेता हो जिसके वश में इंद्रिया हो वही गोविंद है गोपाल है। श्री कृष्ण के पिता का नाम वसुदेव था इसलिए इन्हें आजीवन "वासुदेव" के नाम से जाना गया। श्री कृष्ण के दादा का नाम शूरसेन था। श्री क...

श्री कृष्ण जन्माष्टमी साधना - Shree Krishna Janamashtami Sadhana

श्रीकृष्णजन्माष्टमी साधना ---------------------------------- श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर्व अवसर पर भगवान श्रीकृष्ण का पूजन प्रस्तुत कर रहे है .. ॐ गुं गुरुभ्यो नमः ॐ गं गणेशाय नमः ॐ श्रीकृष्ण परमात्मने नमः अब 4  बार आचमन करे क्लीं आत्मतत्वं शोधयामि स्वाहा क्लीं विद्यातत्वं  शोधयामि स्वाहा क्लीं शिवतत्वं  शोधयामि स्वाहा क्लीं सर्वतत्वं  शोधयामि स्वाहा गुरुमण्डल के लिए पुष्प अक्षत अर्पण करे ॐ  गुरुभ्यो नमः ॐ परम  गुरुभ्यो नमः ॐ पारमेष्ठी  गुरुभ्यो नमः अब आसन पर पुष्प अक्षत अर्पण करे ॐ पृथ्वी त्वया धृता लोका देवी त्वं विष्णुनां धृता त्वं च धारय मां देवी पवित्रम कुरु च आसनं अब सभी दिशाओं में चारो तरफ अक्षत फेके अपसर्पन्तु ते भूता ये भूता भूवि  संस्थिता : ये भूता विघ्नकर्तारस्ते नश्यंतु शिवाग्यया !! दीपक को प्रणाम करे दीप देवताभ्यो नम: अब हाथ मे जल पुष्प लेकर संकल्प करे की आज जन्माष्टमी के दिन भगवान श्रीकृष्ण के जन्मदिन पर भगवान श्रीकृष्ण को प्रसन्न करने हेतु मै श्रीकृष्ण पूजन संपन्न कर रहा हु अब भगवान श्रीकृष्ण का ध्य...

राधे का ख़त - The Letter of Radha (कृष्ण कथा)

ब्रज से वापिस आते वक़्त जो दशा उद्धव जी की थी, उसे सिर्फ वो ही जान सकता है जिसने या तो उन्हें इस हाल में देखा हो या फिर जिन्हें कृष्णा-भक्ति के नशे का थोडा भी अनुमान है। ब्रज की राज में धुल-धूसित, अंग-वस्त्र के ध्यान से परे राधा नाम रटते उद्धव जी मानो रोम-रोम से ब्रज गोपियों का प्रेम - सन्देश हर मथुरा वासी को सुना रहे थे। कान्हा ने तो आते ही उद्धव जी को गले से लगा लिया मानो पूरे ब्रज को आज अपने आलिंगन में भर लिया हो। उद्धव ने आसुओं से गीला वो पत्र श्री कृष्ण के चरणों में रख दिया जो श्री राधे ने स्वयं अपने हाथों से अपने सांवरे को लिखा था। “कान्हा जी, कान्हा जी.... संभव है, आप तो हमें भूल ही गए होंगे। मथुरा की सुन्दर राजकुमारियों के आगे। वैसे भी ब्रज की  ये ग्वालिन कहाँ याद रहने वाली। वैसे भूल तो हम भी आप को गए हैं आप से वादा जो किया था। आपकी मुरली तो हम बिलकुल ही भूल गए केशव, हाँ बस कभी-कभी आपकी तरह पीताम्बर ओढ़ कर ‘कदम’ के नीचे मुरली बजा लेते हैं या सच कहें तो ये संयोग नित्य ही हो जाता है। वैसे तो आपके सर पर सजने वाला मोरमुकुट भी हमें याद नहीं....गोविन्द...हाँ...अपनी...

जय श्री कृष्णा - Jay Shree Krishna

कृष्ण:-- कृष्ण को पूर्णावतार कहा गया है। कृष्ण के जीवन में वह सबकुछ है जिसकी मानव को आवश्यकता होती है। कृष्ण गुरु हैं, तो शिष्य भी। आदर्श पति हैं तो प्रेमी भी। आदर्श मित्र हैं, तो शत्रु भी। वे आदर्श पुत्र हैं, तो पिता भी। युद्ध में कुशल हैं तो बुद्ध भी। कृष्ण के जीवन में हर वह रंग है, जो धरती पर पाए जाते हैं इसीलिए तो उन्हें पूर्णावतार कहा गया है। मूढ़ हैं वे लोग, जो उन्हें छोड़कर अन्य को भजते हैं। ‘भज गोविन्दं मुढ़मते।’ आठ का अंक:-- कृष्ण के जीवन में आठ अंक का अजब संयोग है। उनका जन्म आठवें मनु के काल में अष्टमी के दिन वसुदेव के आठवें पुत्र के रूप में जन्म हुआ था। उनकी आठ सखियां, आठ पत्नियां, आठमित्र और आठ शत्रु थे। इस तरह उनके जीवन में आठ अंक का बहुत संयोग है। कृष्ण के नाम:-- नंदलाल, गोपाल, बांके बिहारी, कन्हैया, केशव, श्याम, रणछोड़दास, द्वारिकाधीश और वासुदेव। बाकी बाद में भक्तों ने रखे जैसे ‍मुरलीधर, माधव, गिरधारी, घनश्याम, माखनचोर, मुरारी, मनोहर, हरि, रासबिहारी आदि। कृष्ण के माता-पिता:-- कृष्ण की माता का नाम देवकी और पिता का नाम वसुदेव था। उनको जिन...

श्री माधवेन्द्र पुरीपाद जी के जीवन की एक सत्य घटना - A Real Incident of Shri Madhvendra Puripad Ji

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एक बार श्री माधवेन्द्र पुरीपाद जी अपने श्री गोवर्धनधारी गोपाल के लिए चन्दन लेने पूर्व देश की ओर गए। चलते - चलते वह ओड़िसा के रेमुणा नामक स्थान पर पहुंचे। वहां पर श्री गोपीनाथ जी के दर्शन कर वह बहुत प्रसन्न हुए। कुछ ही समय में ''अमृतकेलि'' नामक खीर का भोग श्री गोपीनाथ जी को लगाया गया। तब उनके मन में विचार आया कि बिना मांगे ही इस खीर का प्रसाद मिल जाता तो मैं उसका आस्वादन करके, ठीक उसी प्रकार का भोग अपने गोपाल जी को लगाता किन्तु साथ ही साथ अपने आपको धिक्कार दिया कि मेरी खीर खाने की इच्छा हुई। ठाकुर जी की आरती दर्शन करके और उन्हें प्रणाम करके वह मंदिर से चले गये व एक निर्जन स्थान पर बैठ कर हरिनाम का जाप करने लगे। इधर मंदिर के पुजारी ठाकुर गोपीनाथ जी की सेवा कार्य समाप्त कर सो गए। उसे स्वप्न में ठाकुर जी ने दर्शन दिये व कहा- ''पुजारी उठो ! मंदिर के दरवाज़े खोलो। मैंने एक संन्यासी के लिये खीर रखी हुई है जो कि मेरे आंचल के कपड़े से ढकी हुई है। मेरी माया के कारण तुम उसे नहीं जान पाये। माधवेन्द्र पुरी नाम के संन्यासी कुछ ही दूर एक निर्जन स्थान पर...

भजन: हे श्याम तेरी बंसी पागल कर जाती है - He Shyam Teri Bansi Ghayal Kar Jaati Hai

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हे श्याम तेरी बंसी पागल कर जाती है, मुस्कान तेरी मीठी घायल कर जाती है । सोने की होती जो, ना जाने क्या करती, जब बांस की होकर यह दुनिया को नचाती है । तुम गोरे होते जो, ना जाने क्या करते, जब काले रंग पे यह दुनिया मर जाती है । कभी रास रचाते हो, कभी बंसी बजाते हो, कभी माखन खाने की मन में आ जाती है । हे श्याम तेरी बंसी पागल कर जाती है, मुस्कान तेरी मीठी घायल कर जाती है । ।। जय श्री श्याम ।।

भजन: नटवर नागर नंदा भजो रे मन गोविंदा - Natvar Naagar Nanda Bhajo Re Man Govinda

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नटवर नागर नंदा, भजो रे मन गोविंदा । सब देवोँ में देव बड़े हैं, श्याम बिहारी नंदा,  भजो रे मन गोविंदा ।। सब सखिओं में राधा बड़ी हैं, जैसे तारों में चन्दा,  भजो रे मन गोविंदा ।। सब देवोँ में राम बड़े हैं, जिन के सीता संगा,  भजो रे मन गोविंदा ।। सब सखिओं में सीता बड़ी हैं, जैसे तारोँ में चंदा,  भजो रे मन गोविंदा ।। सब देवोँ में शिव जी बड़े हैं, जिन की जटा में गंगा,  भजो रे मन गोविंदा ।। सब देविओं में गौरा बड़ी हैं, जैसे तारोँ में चंदा,  भजो रे मन गोविंदा ।। नटवर नागर नंदा, भजो रे मन गोविंदा ।

कृष्ण और सुदामा का अटूट प्रेम - The Friend Love of Krishna And Sudama

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कृष्ण और सुदामा का प्रेम बहुत गहरा था। प्रेम भी इतना कि कृष्ण, सुदामा को रात दिन अपने साथ ही रखते थे। कोई भी काम होता, दोनों साथ-साथ ही करते। एक दिन दोनों वनसंचार के लिए गए और रास्ता भटक गए। भूखे-प्यासे एक पेड़ के नीचे पहुंचे। पेड़ पर एक ही फल लगा था। कृष्ण ने घोड़े पर चढ़कर फल को अपने हाथ से तोड़ा। कृष्ण ने फल के छह टुकड़े किए और अपनी आदत के मुताबिक पहला टुकड़ा सुदामा को दिया। सुदामा ने टुकड़ा खाया और बोला, "बहुत स्वादिष्ट! ऎसा फल कभी नहीं खाया। एक टुकड़ा और दे दो। दूसरा टुकड़ा भी सुदामा को मिल गया। सुदामा ने एक टुकड़ा और कृष्ण से मांग लिया। इसी तरह सुदामा ने पांच टुकड़े मांग कर खा लिए। जब सुदामा ने आखिरी टुकड़ा मांगा, तो कृष्ण ने कहा, "यह सीमा से बाहर है, मित्र। आखिर मैं भी तो भूखा हूं। मेरा तुम पर प्रेम है, पर तुम मुझसे प्रेम नहीं करते।" और कृष्ण ने फल का टुकड़ा मुंह में रख लिया। मुंह में रखते ही कृष्ण ने उसे थूक दिया, क्योंकि वह कड़वा था। कृष्ण बोले, "तुम पागल तो नहीं, इतना कड़वा फल कैसे खा गए?"  उस सुदामा का उत्तर था- "जिन हाथों से बहुत म...

भजन: भगत के वश में है भगवान - Bhagat Ke Vash Mein Hai Bhagwan

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भगत के वश में है भगवान भक्त बिना ये कुछ भी नहीं है भक्त है इसकी शान भगत मुरली वाले की रोज बृन्दावन डोले  कृष्णा को लल्ला समझे, कृष्णा को लल्ला बोले  श्याम के प्यार में पागल, हुई वो श्याम दीवानी  अगर भजनो में लागे, छोड़ दे दाना पानी प्यार कारन वो लागी उससे अपने पुत्र समान  भगत के वश में है भगवान... वो अपने कृष्णा लला को गले से लगा के रखे  हमेशा सजा कर रखे की लाड लड़ा कर रखे  वो दिन में भाग के देखे, की रात में जाग के देखे  कभी अपने कमरे से, श्याम को झांक के देखे अपनी जान से ज्यादा रखती अपने लला का ध्यान  भगत के वश में है भगवान... वो लल्ला लल्ला पुकारे हाय क्या जुल्म हुआ रे  बुढ़ापा बिगड़ गया जी लाल मेरा कैसे गिरा रे  जाओ डॉक्टर को लाओ लाल का हाल दिखाओ  अगर इसको कुछ हो गया मुझे भी मार गिराओ  रोते रोते पागल होगई घर वाले परेशान  भगत के वश में है भगवान... नब्ज को टटोल के बोले, ये तेरा लाल सही है  कसम खा के कहता हूँ कोई तकलीफ नहीं है  वो माथा देख के बोले ये तेरा लाल...

भजन: नैनन में श्याम समाए गयो मोहे प्रेम का रोग लगाए गयो - Nainan Me Shyam Samaaye Gayo Mohe Prem Ka Rog Lagaaye Gayo

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नैनन में श्याम समाए गयो, मोहे प्रेम का रोग लगाए गयो । लुट जाउंगी श्याम तेरी लटकन पे, बिक जाउंगी लाल तेरी मटकन पे । मोरे कैल गरारे भाए गयो, मोहे प्रेम का रोग लगाए गयो ।। मर जाउंगी काहन तेरी अधरन पे, मिल जाउंगी तेरे नैनन पे । वो तो तिरछी नज़र चलाए गयो, मोहे प्रेम का रोग लगाए गयो ।। बलिहारी कुंवर तेरी अलकन पे, तेरी बेसर की मोती छलकन पे । सपने में कहा पत्राए गायो, मोहे प्रेम का रोग लगाए गयो ।। पागल को प्यारो वो नंदलाला, दीवाना भाए है जाके सब ग्वाला । वो तो मधुर मधुर मुस्काये गायो, मोहे प्रेम का रोग लगाए गयो ।।

भजन: श्याम सपनो में आता क्यूँ नहीं - Shyam Sapno Me Aata Kyun Nahi

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श्याम सपनो में आता क्यूँ नहीं । प्यारी सूरत दिखाता क्यूँ नहीं ।। मेरा दिल तो दीवाना हो गया । मुझे सूरत दिखाता क्यूँ  नहीं ।। मेरे नैयनो में सूरत श्याम की । मुझे दिल से लगाता क्यूँ नहीं ।। सादियो से भटक रहा दर दर पर । मुझे दर पर बुलाता क्यूँ नहीं ।। तेरे प्यार का आधा पागल हूँ । पूरा पागल बनता क्यूँ नहीं ।।

भजन: मेरा कोई ना सहारा बिन तेरे नंदलाल सांवरिया मेरे - Mera Koi Na Sahara Bin Tere Nandlaal Sanwariya Mere

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मेरा कोई ना सहारा बिन तेरे । नंदलाल सांवरिया मेरे ।। युग युग में प्रभु तुम आए । भक्तों के कष्ट मिटाए ।। कल्याग में भी पाओ हुन्न फेरे । नंदलाल सांवरिया मेरे ।। किया कर्म ना नेक कमाई । किये जग में पाप घनेरे ।। काटो जन्म जन्म के फेरे । नंदलाल सांवरिया मेरे ।। मेरा जीवन हैं अभिमानी । प्रभु भक्ति तेरी ना जानी ।। छाए पापों के घोर अँधेरे । नंदलाल सांवरिया मेरे ।। मेरी नैया भंवर में डोले । कब आओगे नैया के खिवैया ।। तुसी आवो सांझ सवेरे । नंदलाल सांवरिया मेरे ।।

भजन: मैं बरसाने की छोरी ना कर मोते बरजोरी - Main Barsane Ki Chori Na Kar Mote Barjori

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मैं बरसाने की छोरी, ना कर मोते बरजोरी तू कारो और मैं गोरी, अपनों मेल नहीं मैं तोसे बांधू प्रीत की डोरी, करता खेल नहीं शुक्र करो की पड़े नहीं यशोदा मैया के डंडे एक डांट में है जाते अरमान तुम्हारे ठन्डे मैं नन्द बाबा का लाला मैं तो ना डरने वाला तेरा पड़ा हैं मोसे पाला करता खेल नहीं मैं गुजरी तू गवाला, अपनों मेल नहीं मैं बरसाने की छोरी... जहाँ जहाँ मैं जाती हूँ क्यों पीछे पीछे आए तेरो मेरो मेल नहीं, यह कौन तुम्हे समझाए तू मुझको ना पहचानी, पिया घाट घाट का पानी मैं दरिया हूँ तूफानी करता खेल नहीं अरे ना कर मोसू छैतानी, अपनों मेल नहीं मैं बरसाने की छोरी... ऐसी वैसी नार नहीं क्यों मोपे डोरे डाले बीच डगर में छोड़ सतानो, ओ गोकुल के ग्वाले मेरा रोज का आना जाना, नरसी का माखन खाना  ‘शर्मा’ है श्याम दीवाना करता खेल नहीं अरे तू गोकुल मैं बरसानो, अपनों मेल नहीं मैं बरसाने की छोरी... ।। जय श्री राधे ।।

भजन: मुझको राधा रमन करदो ऐसा मगन - Mujhko Radha Raman Kardo Aisa Magan

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मुझको राधा रमन, करदो ऐसा मगन, रटूं तेरा नाम, मैं आठों याम । करुणानिधान मोपे कृपा कर रिझिए, बृज में बसाके मोहे सेवा सुख दीजिए । प्रेम से भरदो मन, गाउँ तेरे भजन, रटूं तेरा नाम, मैं आठों याम ।। भाव भरे भूषणो से आपको सजाऊँ मैं, नितनव् भोज निज हाथों से पवाऊं मैं । करो जब तुम शयन, दाबू तुमरे चरण, रटूं तेरा नाम, मैं आठों याम ।। जब भी विहार करो, प्यारी संग सांवरे, फूल बन जाऊं जहां, धरो तुम पाँव रे । बनके शीतल पवन छू लूँ तेरा बदन, रटूं तेरा नाम, मैं आठों याम ।। तुम्हे देख जीऊं तुम्हे देख मर जाऊं मैं, जनम जनम तेरा दास ही कहाऊं मैं । रख लो अपनी शरण, करदो मन में रमन,  रटूं तेरा नाम, मैं आठों याम ।।

भजन: श्याम तेरी बन्सी पुकारे राधा नाम - Shyam Teri Bansi Pukaare Radha Naam

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श्याम तेरी बन्सी पुकारे राधा नाम । लोग करे मीरा को यूँ ही बदनाम ।। साँवरे की बन्सी को बजने से काम । राधा का भी श्याम, वो तो मीरा का भी श्याम ।। यमुना की लहरें बन्सीबट की छैया । किसका नहीं है कहो कृष्ण कन्हैया ।। श्याम का दीवाना, तो सारा बृजधाम । लोग करे मीरा को यूँ ही बदनाम ।। कोन जाने बाँसुरिया किसको बुलाए । जिसके मन भाए, वो उसीके गुन गाए ।। कोन नहीं बन्सी की धुन का गुलाम । राधा का भी श्याम, वो तो मीरा का भी श्याम ।।

भजन: बांके बिहारी की देख छटा मेरो मन है गयो लटा पटा - Banke Bihari Ki Dekh Chata Mero Man Hai Gayo Lata Pata

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बांके बिहारी की देख छटा, मेरो मन है गयो लटा पटा । कब से खोजूं बनवारी को, बनवारी को, गिरिधारी को । कोई बता दे उसका पता, मेरो मन है गयो लटा पटा ।। मोर मुकुट श्यामल तन धारी, कर मुरली अधरन सजी प्यारी । कमर में बांदे पीला पटा, मेरो मन है गयो लटा पटा ।। पनिया भरन यमुना तट आई, बीच में मिल गए कृष्ण कन्हाई । फोर दियो पानी को घटा, मेरो मन है गयो लटा पटा ।। टेडी नज़रें लत घुंघराली, मार रही मेरे दिल पे कटारी । और श्याम वरन जैसे कारी घटा, मेरो मन है गयो लटा पटा ।। मिलते हैं उसे बांके बिहारी, बांके बिहारी, सनेह बिहारी । राधे राधे जिस ने रटा, मेरो मन है गयो लटा पटा ।। बांके बिहारी की देख छटा, मेरो मन है गयो लटा पटा ।

भजन: हम पर नज़र कृपा की करना करुणामयी श्यामा प्यारी - Ham Par Nazar Kripa Ki Karna Karunamayi Shyama Pyari

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हम पर नज़र कृपा की करना, करुणामयी श्यामा प्यारी, करुणा रस बरसाती रहना, करुणामयी श्यामा प्यारी । करे गुणगान तेरा निस दिन, नाम रस पान करे निसदिन, नाम की बहती गंगा में सभी इसनान करे निस दिन, यही विनती करे तुमसे, यही विनती करे तुमसे । करुणा मई श्यामा प्यारी... रहे हम दूर गुनाहो से, हटे ना सत्य की राहों से, गिरे सौ बार मगर लेकिन धिरे ना तेरी निगाहों से, यही विनती करे तुमसे, यही विनती करे तुमसे । करुणा मई श्यामा प्यारी... कामना पूर्ण कर देना, ख़ुशी से दामन भर देना, शरण में आने वालो को सदा मनचाहा वर देना, यही विनती करे तुमसे, यही विनती करे तुमसे । करुणा मई श्यामा प्यारी... सभी के कष्ट मिटा देना, सोई तकदीर जगा देना, बना कर ‘दास’ हमे अपना, श्री चरणों में जगह देना, यही विनती करे तुमसे, यही विनती करे तुमसे । करुणा मई श्यामा प्यारी... ।। जय श्री राधे ।।