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Showing posts with the label Moral Story

हृदय परिवर्तन - Heart Change

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एक राजा को राज भोगते काफी समय हो गया था। बाल भी सफ़ेद होने लगे थे। एक दिन उसने अपने दरबार में उत्सव रखा और अपने गुरुदेव एवं मित्र देश के राजाओं को भी सादर आमन्त्रित किया। उत्सव को रोचक बनाने के लिए राज्य की सुप्रसिद्ध नर्तकी को भी बुलाया गया। राजा ने कुछ स्वर्ण मुद्रायें अपने गुरु जी को भी दीं, ताकि नर्तकी के अच्छे गीत व नृत्य पर वे उसे पुरस्कृत कर सकें। सारी रात नृत्य चलता रहा। ब्रह्म मुहूर्त की बेला आयी। नर्तकी ने देखा कि मेरा तबले वाला ऊँघ रहा है, उसको जगाने के लिए नर्तकी ने एक दोहा पढ़ा-  "बहु बीती, थोड़ी रही, पल पल गयी बिताई। एक पलक के कारने, ना कलंक लग जाए।।" अब इस दोहे का अलग-अलग व्यक्तियों ने अपने अनुरुप अर्थ निकाला। तबले वाला सतर्क होकर बजाने लगा। जब यह बात गुरु जी ने सुनी। गुरु जी ने सारी मोहरें उस नर्तकी के सामने फैंक दीं। वही दोहा नर्तकी ने फिर पढ़ा तो राजा की लड़की ने अपना नवलखा हार नर्तकी को भेंट कर दिया। उसने फिर वही दोहा दोहराया तो राजा के पुत्र युवराज ने अपना मुकट उतारकर नर्तकी को समर्पित कर दिया। नर्तकी फिर वही दोहा दोहराने लगी तो राजा ने कह...

रक्षा-बंधन पर बहन से वादा - Promise to Sister on Raksha-Bandhan

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सुबह बहन जल्दी उठती है और घर के सारे कामों को खत्म कर अपने भैया को जगाती है। बहन -  भैया उठो ना, जल्दी से उठो ना, आज रक्षाबन्धन  है। आप जल्दी से तैयार हो जाओ, मै सबसे पहले आपको राखी बांधुगी। भाई - ठीक है। भाई तैयार हो जाता है और बहन पूजा की थाली, मिठाई और राखी लेकर आती है बहन -  भैया अपना दाहिना हाथ आगे बढाओ। भाई अपना हाथ आगे करके राखी बंधवा लेता है और जेब से निकालकर उसको एक खूबसूरत घड़ी देता है। ( जो उसने बहन के लिए एक दिन पहले ही खरीदी थी ) लेकिन बहन मना कर देती है फिर भाई अपने पर्स से कुछ पैसे निकाल कर देता है लेकिन बहन फिर वापस कर देती है। तब भाई पुछता है कि बताओ तुम्हे क्या चाहिए ? बहन -  जो मागुंगी वो दोगे ? भाई - हां दुंगा। बहन - पहले मुझसे वादा करो ? भाई - हां मैं पक्का वादा करता हूँ कि जो तू मांगेंगी वो मैं दुंगा। अब बोल तुझे क्या चाहिए ? बहन -  भैया आज रक्षाबन्धन के दिन आप मुझसे ये वादा करो कि आप आज से  मां और बहन की गालियां नहीं दोगे। इतना कहकर उसकी आंखों में आसूं आ जाते हैं। (बहन रोते हुए )...

हम रामकथा क्यों सुने ? Why do we listen Ram Katha?

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रामकथा सुंदर कर तारी। संसय बिहग उड़ावनिहारी॥ रामकथा कलि बिटप कुठारी। सादर सुनु गिरिराजकुमारी॥ भावार्थ :- श्री रामचन्द्रजी की कथा हाथ की सुंदर ताली है, जो संदेह रूपी पक्षियों को उड़ा देती है। फिर रामकथा कलियुग रूपी वृक्ष को काटने के लिए कुल्हाड़ी है। हे गिरिराजकुमारी! तुम इसे आदरपूर्वक सुनो॥ राम कथा और भगवान कथा की महिमा - बंधुओं, भगवान श्री राम ने कुछ ही जीवों का उद्धार किया होगा। हजारों, लाखों का। लेकिन भगवान श्री राम की कथा  तो आज भी करोड़ों लोगो का उद्धार कर रही है। राम कथा सुनो , कृष्ण कथा सुनो, हरी कथा सुनो, शिव कथा सुनो आपके जो भी इष्ट देव है उनकी कथा सुनों, क्योंकि इस धरती पर अगर वास्तव में कुछ सुनने के लिए है तो वो है सिर्फ भगवान की कथा। और जिसने सुनी हैं तो दोबारा सुनो। राम चरित्र को जीवन में धारण करने की कोशिश करो। यदि कोई कहे की हमने रामायण पढ़ ली हैं। देखिये तुलसीदास जी कितना सुंदर कह रहे हैं- राम चरित जे सुनत अघाहीं। रस बिसेष जाना तिन्ह नाहीं॥ जीवनमुक्त महामुनि जेऊ। हरि गुन सुनहिं निरंतर तेऊ॥ भावार्थ :- श्री रामजी के चरित्र सुनते-सुनते जो तृप्त हो ...

नमक का स्वाद - Taste of Salt (Shri Krishna and Satyabhama)

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एक बार सत्यभामा ने श्रीकृष्ण से पूछा - मैं आप को कैसी लगती हूँ ? श्रीकृष्ण ने कहा तुम मुझे नमक जैसी लगती हो। सत्यभामा इस तुलना को सुन कर क्रुद्ध हो गयी, तुलना भी की तो किस से, आपको इस संपूर्ण विश्व में मेरी तुलना करने के लिए और कोई पदार्थ नहीं मिला। श्रीकृष्ण ने उस वक़्त तो किसी तरह सत्यभामा को मना लिया और उनका गुस्सा शांत कर दिया। कुछ दिन पश्चात श्रीकृष्ण ने अपने महल में एक भोज का आयोजन किया। छप्पन भोग की व्यवस्था हुई। श्रीकृष्ण ने सर्वप्रथम आठों पटरानियों को, जिनमें पाकशास्त्र में निपुण सत्यभामा भी थी, से भोजन प्रारम्भ करने का आग्रह किया। सत्यभामा ने पहला कौर मुँह में डाला मगर यह क्या.. सब्जी में नमक ही नहीं था। सत्यभामा ने उस कौर को मुँह से निकाल दिया। फिर दूसरा कौर मावा-मिश्री का मुँह में डाला और फिर उसे चबाते-चबाते बुरा सा मुँह बनाया और फिर पानी की सहायता से किसी तरह मुँह से उतारा। अब तीसरा कौर फिर कचौरी का मुँह में डाला और फिर.. आक्..थू ! तब तक सत्यभामा का पारा सातवें आसमान पर पहुँच चुका था। जोर से चीखीं.. किसने बनाई है यह रसोइ ? सत्यभामा की आवाज सुन कर श्रीकृष्ण दौड़ते ह...

नदी और दोस्त - River and Friend (A Motivational Story)

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एक गांव में दो दोस्त रहते थे। एक बार उन्होंने शहर जाकर कुछ काम करने का फैसला किया और शहर के लिए निकल पड़े। गांव के अंत में एक जमी हुई नदी थी। शहर जाने के लिए उन्हें वह नदी पार करनी ही थी। वहां कोई पुल भी नहीं था।  ऐसे में एक दोस्त ने कहा कि नदी पार करना खतरनाक है, इसलिए बेहतर है कि गांव में ही रहें। हालांकि, दूसरा दोस्त कुछ और ही सोच रहा था। उसने मन में निश्चय कर लिया था कि वह किसी भी कीमत पर शहर जाकर ही रहेगा।  अपने इस दृढ़-निश्चय के साथ वह जमी हुई नदी पर आगे बढ़ने लगा। उसका दोस्त किनारे पर खड़ा होकर उसे ऐसा करने से रोक रहा था। वह चिल्ला रहा था कि तुम गिर जाओगे। कुछ कदम चलने के बाद वह लड़का जमी हुई नदी पर फिसल गया।  किनारे खड़े दोस्त ने उसे लौटने के लिए कहा लेकिन वह फिर से खड़ा हुआ और आगे बढ़ने लगा। सावधानी से आगे बढ़ते हुए उसने आखिरकार नदी पार कर ली और शहर की ओर बढ़ गया। वहीं, उसके दोस्त ने नदी पार करने की कोशिश ही नहीं की और वहीं राह गया। मंत्र: अगर आप कुछ ठान लें तो अवश्य ही उसे हासिल कर सकते हैं।

एक बेटा और वृद्ध पिता - A Son and Old Father (A Moral Story)

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एक बेटा अपने वृद्ध पिता को रात्रि भोज के लिए एक अच्छे रेस्टॉरेंट में लेकर गया। खाने के दौरान वृद्ध पिता ने कई बार भोजन अपने कपड़ों पर गिराया। रेस्टॉरेंट में बैठे खाना खा रहे दूसरे लोग वृद्ध को घृणा की नजरों से देख रहे थे, लेकिन वृद्ध का बेटा शांत था। खाने के बाद बिना किसी शर्म के बेटा, वृद्ध को वॉश रूम ले गया। उनके कपड़े साफ़ किये, उनका चेहरा साफ़ किया, उनके बालों में कंघी की,चश्मा पहनाया और फिर बाहर लाया। सभी लोग खामोशी से उन्हें ही देख रहे थे। बेटे ने बिल का भुगतान किया और वृद्ध के साथ बाहर जाने लगा। तभी डिनर कर रहे एक अन्य वृद्ध ने बेटे को आवाज दी और उससे पूछा "क्या तुम्हे नहीं लगता कि यहाँ अपने पीछे तुम कुछ छोड़ कर जा रहे हो ?" बेटे ने जवाब दिया "नहीं सर, मैं कुछ भी छोड़ कर नहीं जा रहा।" वृद्ध ने कहा "बेटे, तुम यहाँ छोड़ कर जा रहे हो, प्रत्येक पुत्र के लिए एक शिक्षा (सबक) और प्रत्येक पिता के लिए उम्मीद (आशा)।" आमतौर पर हम लोग अपने बुजुर्ग माता पिता को अपने साथ बाहर ले जाना पसंद नहीँ करते और कहते हैं क्या करोगे आप? आप से चला तो जाता नह...

धर्म और मुक्ति - Religion and Liberation

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शिप्रा नदी के पास बसे एक गांव से एक पंडित रोज नदी को पार कर उज्जैन शहर मे रहने वाले एक धनी सेठ को कथा सुनाने जाता था। पंडित रोज सेठ को कथा सुनाता और बदले में सेठ उसे धन दान देता। ऐसे ही एक दिन जब वह पण्डित सेठ को कथा सुनाने के लिये नदी को पार करके जा रहा था तो उसे एक आवाज सुनाई दी - "कभी हमें भी ज्ञान दे दिया करो।" पण्डित ने इधर-उधर देखा मगर उसे वहां कोई दिखाई नही दिया। उसे फिर अपने पास से ही एक आवाज सुनाई दी - "पण्डित जी मैं यहाँ हूँ।" पण्डित ने देखा कि वह एक घड़ियाल था। पण्डित जी हैरान भी थे घड़ियाल को इंसान की आवाज में बोलते सुनकर और घबराये भी थे। घड़ियाल ने कहा - "पण्डित जी आप डरिये नही आप मुझे कथा सुनाकर ज्ञान प्रदान करे और यह सब मैं मुफ्त में भी नही मांग रहा हूँ। आपकी कथा के बदले में रोज आपको एक अशर्फी मैं दिया करूंगा।" पण्डित को बात जची। पण्डित को तो धन की चाहत थी फिर चाहे वो उसे नदी के उस पार सेठ को कथा सुनाने से मिले या नदी के इस किनारे घड़ियाल को कथा सुनाकर मिले। रोज वह पण्डित घड़ियाल को कथा सुनाता और रोज घड़ियाल पण्डित को एक अशर्फी बदल...

आम का पेड़ - The Tree of Mango (A Heart Touching Story)

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एक बच्चे को आम का पेड़ बहुत पसंद था। जब भी फुर्सत मिलती वो आम के पेड के पास पहुच जाता। पेड के उपर चढ़ता, आम खाता, खेलता और थक जाने पर उसी की छाया मे सो जाता। उस बच्चे और आम के पेड के बीच एक अनोखा रिश्ता बन गया। बच्चा जैसे-जैसे बडा होता गया वैसे-वैसे उसने पेड के पास आना कम कर दिया। कुछ समय बाद तो बिल्कुल ही बंद हो गया। आम का पेड उस बालक को याद करके अकेला रोता। एक दिन अचानक पेड ने उस बच्चे को अपनी तरफ आते देखा और पास आने पर कहा- "तू कहां चला गया था? मै रोज तुम्हे याद किया करता था। चलो आज फिर से दोनो खेलते है।" बच्चे ने आम के पेड से कहा- "अब मेरी खेलने की उम्र नही है। मुझे पढना है, लेकिन मेरे पास फीस भरने के पैसे नही है।" पेड ने कहा- "तू मेरे आम लेकर बाजार मे बेच दे। इससे जो पैसे मिले उससे अपनी फीस भर देना।" उस बच्चे ने आम के पेड से सारे आम तोड़ लिए और उन सब आमो को लेकर वहा से चला गया। उसके बाद फिर कभी दिखाई नही दिया। आम का पेड उसकी राह देखता रहता। एक दिन वो फिर आया और कहने लगा- "अब मुझे नौकरी मिल गई है, मेरी शादी भी हो चुकी है, मुझे मेरा अपना ...

सातवां घड़ा - Seventh Pitcher (A Moral Story)

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एक गाँव में एक नाई अपनी पत्नी और बच्चों के साथ रहता था। नाई ईमानदार था, अपनी कमाई से संतुष्ट था। उसे किसी तरह का लालच नहीं था। नाई की पत्नी भी अपनी पति की कमाई हुई आय से बड़ी कुशलता से अपनी गृहस्थी चलाती थी। कुल मिलाकर उनकी जिंदगी बड़े आराम से हंसी-खुशी से गुजर रही थी। नाई अपने काम में बहुत निपुण था। एक दिन वहाँ के राजा ने नाई को अपने पास बुलवाया और रोज उसे महल में आकर हजामत बनाने को कहा। नाई ने भी बड़ी प्रसन्नता से राजा का प्रस्ताव मान लिया। नाई को रोज राजा की हजामत बनाने के लिए एक स्वर्ण मुद्रा मिलती थी।  इतना सारा पैसा पाकर नाई की पत्नी भी बड़ी खुश हुई। अब उसकी जिन्दगी बड़े आराम से कटने लगी। घर पर किसी चीज की कमी नहीं रही और हर महीने अच्छी रकम की बचत भी होने लगी। नाई, उसकी पत्नी और बच्चे सभी खुश रहने लगे। एक दिन शाम को जब नाई अपना काम निपटा कर महल से अपने घर वापस जा रहा था, तो रास्ते में उसे एक आवाज सुनाई दी। आवाज एक यक्ष की थी। यक्ष ने नाई से कहा, ‘‘मैंने तुम्हारी ईमानदारी के बड़े चर्चे सुने हैं, मैं तुम्हारी ईमानदारी से बहुत खुश हूँ और तुम्हें सोने क...

शर्मा जी और केले बेचने वाली बुढ़िया - Sharma Ji and Banana Sellers Old Lady (मोल भाव)

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ऑफिस से निकल कर शर्मा जी ने स्कूटर स्टार्ट किया ही था कि उन्हें याद आया, पत्नी ने कहा था 1 दर्ज़न केले लेते आना।  तभी उन्हें सड़क किनारे बड़े और ताज़ा केले बेचते हुए एक बीमार सी दिखने वाली बुढ़िया दिख गयी। वैसे तो शर्मा जी फल हमेशा "राम आसरे फ्रूट भण्डार" से ही लेते थे, पर आज उन्हें लगा कि क्यों न बुढ़िया से ही खरीद लूँ ?  उन्होंने बुढ़िया से पूछा- "माई, केले कैसे दिए।" बुढ़िया बोली- बाबूजी 20 रूपये दर्जन। शर्मा जी बोले- माई 15 रूपये दूंगा। बुढ़िया ने कहा- 18 रूपये दे देना, दो पैसे मै भी कमा लूंगी।  शर्मा जी बोले- 15 रूपये लेने हैं तो बोल। बुझे चेहरे से बुढ़िया ने "न" मे गर्दन हिला दिया। शर्मा जी बिना कुछ कहे चल पड़े और राम आसरे फ्रूट भण्डार पर आकर केले का भाव पूछा तो वह बोला 28 रूपये दर्जन हैं। बाबूजी, कितने दर्जन दूँ ? शर्मा जी बोले- 5 साल से फल तुमसे ही ले रहा हूँ, ठीक भाव लगाओ। तो फलवाले ने सामने लगे बोर्ड की ओर इशारा कर दिया। बोर्ड पर लिखा था- "मोल भाव करने वाले माफ़ करें।" शर्माजी को उसका यह व्यवहार बहुत बुरा लगा, उ...

संत और कसाई का तोता - Parrot of the Sage and Butcher (संगति का असर)

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एक राजा ने एक तोता पाल रखा था। एक दिन वह तोता मर गया। राजा ने मंत्री को कहा- "मंत्रीवर, हमारा तोते का पिंजरा सूना हो गया है। इसमें पालने के लिए एक तोता लाओ। अब, तोते सदैव तो मिलते नहीं। लेकिन राजा पीछे पड़ गये तो मंत्री एक संत के पास गये और कहा- "भगवन्, राजा साहब एक तोता लाने की जिद कर रहे हैं। आप अपना तोता दे दें तो बड़ी कृपा होगी।" संत ने कहा- "ठीक है, ले जाओ।" राजा ने सोने के पिंजरे में बड़े स्नेह से तोते की सुख-सुविधा का प्रबन्ध किया। ब्रह्म मुहूर्त होते ही तोता बोलने लगता- "ओम् तत्सत्... ओम् तत्सत्... उठो राजा! उठो महारानी! दुर्लभ मानव-तन मिला है। यह सोने के लिए नहीं, भजन करने के लिए मिला है।" चित्रकूट के घाट पर, भई संतन की भीर । तुलसीदास चंदन घिसै, तिलक देत रघुबीर ।। कभी रामायण की चौपाई, तो कभी गीता के श्लोक तोते के मुँह से निकलते। पूरा राजपरिवार बड़े सवेरे उठकर उसकी बातें सुना करता था। राजा कहते थे कि सुग्गा क्या मिला, एक संत मिल गये। हर जीव की एक निश्चित आयु होती है। एक दिन वह सुग्गा मर गया। राजा, रानी, राजपरिवार और पूरे राष्ट्र ने हफ़...

कृष्ण और सुदामा का अटूट प्रेम - The Friend Love of Krishna And Sudama

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कृष्ण और सुदामा का प्रेम बहुत गहरा था। प्रेम भी इतना कि कृष्ण, सुदामा को रात दिन अपने साथ ही रखते थे। कोई भी काम होता, दोनों साथ-साथ ही करते। एक दिन दोनों वनसंचार के लिए गए और रास्ता भटक गए। भूखे-प्यासे एक पेड़ के नीचे पहुंचे। पेड़ पर एक ही फल लगा था। कृष्ण ने घोड़े पर चढ़कर फल को अपने हाथ से तोड़ा। कृष्ण ने फल के छह टुकड़े किए और अपनी आदत के मुताबिक पहला टुकड़ा सुदामा को दिया। सुदामा ने टुकड़ा खाया और बोला, "बहुत स्वादिष्ट! ऎसा फल कभी नहीं खाया। एक टुकड़ा और दे दो। दूसरा टुकड़ा भी सुदामा को मिल गया। सुदामा ने एक टुकड़ा और कृष्ण से मांग लिया। इसी तरह सुदामा ने पांच टुकड़े मांग कर खा लिए। जब सुदामा ने आखिरी टुकड़ा मांगा, तो कृष्ण ने कहा, "यह सीमा से बाहर है, मित्र। आखिर मैं भी तो भूखा हूं। मेरा तुम पर प्रेम है, पर तुम मुझसे प्रेम नहीं करते।" और कृष्ण ने फल का टुकड़ा मुंह में रख लिया। मुंह में रखते ही कृष्ण ने उसे थूक दिया, क्योंकि वह कड़वा था। कृष्ण बोले, "तुम पागल तो नहीं, इतना कड़वा फल कैसे खा गए?"  उस सुदामा का उत्तर था- "जिन हाथों से बहुत म...

भगवान श्री जगन्नाथ जी को भेंट - Donation to Lord Shri Jagannath Ji

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बहुत पुरानी बात है, एक सेठ के पास एक व्यक्ति काम करता था। सेठ उस व्यक्ति पर बहुत विश्वास करता था जो भी जरुरी काम हो वह सेठ हमेशा उसी व्यक्ति से कहता था। वो व्यक्ति भगवान का बहुत बड़ा भक्त था। वह सदा भगवान के चिंतन भजन कीर्तन स्मरण सत्संग आदि का लाभ लेता रहता था। एक दिन उस भक्त ने सेठ से श्री जगन्नाथ धाम यात्रा करने के लिए कुछ दिन की छुट्टी मांगी सेठ ने उसे छुट्टी देते हुए कहा- "भाई मैं तो हूँ संसारी आदमी, हमेशा व्यापार के काम में व्यस्त रहता हूँ जिसके कारण कभी तीर्थ गमन का लाभ नहीं ले पाता। तुम जा ही रहे हो तो यह लो 100 रुपए मेरी ओर से श्री जगन्नाथ प्रभु के चरणों में समर्पित कर देना।" भक्त सेठ से सौ रुपए लेकर श्री जगन्नाथ धाम यात्रा पर निकल गया। कई दिन की पैदल यात्रा करने के बाद वह श्री जगन्नाथ पुरी पहुंचा। मंदिर की ओर प्रस्थान करते समय उसने रास्ते में देखा कि बहुत सारे संत, भक्त जन, वैष्णव जन, हरि नाम संकीर्तन बड़ी मस्ती में कर रहे हैं। सभी की आंखों से अश्रु धारा बह रही है। जोर-जोर से हरि बोल, हरि बोल गूंज रहा है। संकीर्तन में बहुत आनंद आ रहा था। भक्त भी वहीं रुक कर ह...

भगवान और एक बालक - The God And a Child (माँ-बाप से बढ़कर कुछ नही)

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एक बालक अपने माँ-बाप की खूब सेवा किया करता था। उसके दोस्त उससे कहते कि अगर इतनी सेवा तुमने भगवान की की होती तो तुम्हे भगवान मिल जाते। लेकिन इन सब चीजो से अनजान वो अपने माता पिता की सेवा करता रहा। एक दिन उसकी माँ बाप की सेवा-भक्ति से खुश होकर भगवान धरती पर आ गये। उस वक्त वो बालक अपनी माँ के पाँव दबा रहा था। भगवान दरवाजे के बाहर से बोले- "दरवाजा खोलो बेटा मैं तुम्हारी माता-पिता की सेवा से प्रसन्न होकर तुम्हे वरदान देने आया हूँ।" बालक ने कहा- "इंतजार करो प्रभु, मैं माँ की सेवा मे लगा हूँ।" भगवान बोले- "देखो मैं वापस चला जाऊँगा।" बालक ने कहा- "आप जा सकते है भगवान, मैं सेवा बीच मे नही छोड़ सकता।" कुछ देर बाद उसने दरवाजा खोला तो क्या देखता है भगवान बाहर खड़े थे। भगवान बोले- "लोग मुझे पाने के लिये कठोर तपस्या करते है पर मैं तुम्हे सहज ही मे मिल गया पर तुमने मुझसे प्रतीक्षा करवाई।" बालक ने जवाब दिया- "हे ईश्वर जिस माँ बाप की सेवा ने आपको मेरे पास आने को मजबूर कर दिया उन माँ बाप की सेवा बीच मे छोड़कर मैं दरवाजा खोलने कैसे आता।...

भगवान विष्णु भक्त नारद मुनि - Lord Vishnu Devotee Narad Muni

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एक बार नारद मुनि पृथ्वी का भ्रमण कर रहे थे। तब उन्हें उनके एक खास भक्त जो नगर का सेठ था ने याद किया। अच्छी सत्कार के बाद सेठ ने नारद जी से प्रार्थना की- "आप ऐसा कोई आर्शीवाद दें कि कम से कम एक बच्चा हो जाए।" नारद ने कहा कि तुम लोग चिंता न करो, मैं अभी प्रभु नारायण से मिलने जा रहा हूं। उन तक तुम्हारी प्रार्थना पहुंचा दूंगा और वे अवश्य कुछ करेंगे। नारद विष्णु धाम गए और सेठ की व्यथा बताई। भगवन्‌ बोले कि उसके भाग्य में संतान सुख नहीं है इसलिए कुछ नहीं हो सकता।  उसके कुछ समय बाद नारद ने एक दीये में तेल ऊपर तक भरा और अपनी हथेली पर सजाया और पूरे विश्व की यात्रा की। अपनी निर्विघ्न यात्रा का समापन उन्होंने विष्णु धाम आकर ही संपन्न किया। इस पूरी प्रक्रिया में नारद को बड़ा घमंड हो गया कि उनसे ज्यादा ध्यानी और विष्णु भक्त कोई ओर नहीं। अपने इसी घमंड में नारद पुनः पृथ्वी लोक पर आए और उसी सेठ के घर पहुंचे। इस दौरान सेठ के घर में छोटे-छोटे चार बच्चे घूम रहे थे।  नारद ने जानना चाहा कि ये संतान किसकी हैं तो सेठ बोले- "आपकी हैं प्रभु।" नारद इस बात से खुश न...

शिव भक्त और भिखारी - The Shiva Divotee And Beggar

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एक बार एक धनिक शिव भक्त शिवालय जाता है। पैरों में महँगे और नये जूते होने पर सोचता है कि क्या करूँ? जूते यदि बाहर उतार कर जाता हूँ तो कोई उठा न ले जाये और अंदर पूजा में भी मन नहीं लगेगा। सारा ध्यान जूतों पर ही रहेगा। तभी उसे बाहर एक भिखारी बैठा दिखाई देता है। वह धनिक भिखारी से कहता है- "भाई जब तक मैं पूजा करके वापस न आ जाऊँ, तब तक मेरे जूतों का ध्यान रखोगे?" भिखारी हाँ कर देता है। अंदर पूजा करते समय धनिक सोचता है कि "हे प्रभु आपने यह कैसा असंतुलित संसार बनाया है? किसी को इतना धन दिया है कि वह पैरों तक में महँगे जूते पहनता है तो किसी को अपना पेट भरने के लिये भीख तक माँगनी पड़ती है! कितना अच्छा हो कि सभी एक समान हो जायें!" वह धनिक निश्चय करता है कि वह बाहर आकर भिखारी को 100 का एक नोट देगा। बाहर आकर वह धनिक देखता है कि वहाँ न तो वह भिखारी है और न ही उसके जूते। धनिक ठगा सा रह जाता है। वह कुछ देर भिखारी का इंतजार करता है कि शायद भिखारी किसी काम से कहीं चला गया हो। पर वह नहीं आया। धनिक दुखी मन से नंगे पैर घर के लिये चल देता है। रास्ते में फुटपाथ पर देखता है क...

सुख की माया में खोए मन को भगवान भी नहीं बचा सकते - God Can't Save The Lost Mind in Happiness

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एक इंसान घने जंगल में भागा जा रहा था। शाम हो गई थी इसलिए अंधेरे में कुआं दिखाई नहीं दिया और वह उसमें गिर गया। गिरते-गिरते कुएं पर झुके पेड़ की एक डाल उसके हाथ में आ गई। जब उसने नीचे झांका, तो देखा कि कुएं में चार अजगर मुंह खोले उसे देख रहे हैं। जिस डाल को वह पकड़े हुए था, उसे दो चूहे कुतर रहे थे। इतने में एक हाथी आया और पेड़ को जोर-जोर से हिलाने लगा। वह घबरा गया और सोचने लगा कि हे भगवान अब क्या होगा ? उसी पेड़ पर एक मधुमक्खियों का छत्ता लगा हुआ था। हाथी के पेड़ को हिलाने से मधुमक्खियां उडऩे लगीं और शहद की बूंदें टपकने लगीं। एक बूंद उसके होठों पर आ गिरी। उसने प्यास से सूख रही जीभ को होठों पर फेरा, तो उसे शहद की उस बूंद में गजब की मिठास का अनुभव हुआ। कुछ पल बाद फिर शहद की एक और बूंद उसके मुंह में टपकी। अब वह इतना मगन हो गया कि अपनी मुश्किलों को भूल गया। तभी उस जंगल से भगवान अपने वाहन से गुजरे। भगवान ने उसके पास जाकर कहा - मैं तुम्हें बचाना चाहता हूं। मेरा हाथ पकड़ लो। उस इंसान ने कहा कि एक बूंद शहद और चाट लूं, फिर चलता  हूँ। एक बूंद, फि...

नरेंद्र मोदी जी के बचपन का किस्सा 'जब गाय ने छोड़ दिया शरीर...' - An Anecdote of The Childhood of Narendra Modi

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साबरमती आश्रम(अहमदाबाद) में गौरक्षा के नाम पर हो रही हिंसा को लेकर नरेंद्र मोदी जी अपनी बात रखते हुए भावुक हो गए। उन्होंने अपने बचपन का एक किस्सा सुनाकर गौ-रक्षकों को अहिंसा का संदेश दिया। मोदी जी ने कहा- ''देशवासियों से आग्रह करता हूं कि हिंसा समस्याओं का समाधान नहीं है। महात्मा गांधी-विनोबा भावे जीवनभर गौरक्षा के लिए लड़ते रहे। लेकिन क्या हमें किसी इंसान को मारने का हक मिल जाता है? क्या ये गौ-भक्ति है? क्या ये गौ-रक्षा है? ये गांधीजी, विनोबाजी का रास्ता नहीं हो सकता, जिन्होंने गौ-रक्षा के लिए अपना सारा जीवन समर्पित कर दिया।''     मोदी जी ने सुनाई गाय की कहानी... मोदी जी ने कहा- ''मेरे जीवन की एक घटना है, जिसे मैं लिखना चाहता था। मैं बालक था। गांव में मेरा घर एक छोटी-सी गली में है। हमारे घर से सामने एक परिवार था, जो मजदूरी करता था। उनकी कोई संतान नहीं थी। परिवार में इसे लेकर तनाव रहता था। बहुत देर में उनके यहां संतान हुई।'' ''मोहल्ले में बहुत संकरी गली थी। एक गाय रोज घरों के सामने आती थी। एक बार अचानक कोई हलचल हो गई। गाय ...

जौहरी और मां का नकली हार - Jeweller and Fake Necklace of Mother

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एक जौहरी के निधन के बाद उसका परिवार संकट में पड़ गया। खाने के भी लाले पड़ गए। एक दिन उसकी पत्नी ने अपने बेटे को नीलम का एक हार देकर कहा- "बेटा, इसे अपने चाचा की दुकान पर ले जाओ। कहना इसे बेचकर कुछ रुपये दे दें।" बेटा वह हार लेकर चाचा जी के पास गया। चाचा ने हार को अच्छी तरह से देख परखकर कहा- "बेटा, मां से कहना कि अभी बाजार बहुत मंदा है। थोड़ा रुककर बेचना, अच्छे दाम मिलेंगे।" उसे थोड़े से रुपये देकर कहा कि- "तुम कल से दुकान पर आकर बैठना।" अगले दिन से वह लड़का रोज दुकान पर जाने लगा और वहां हीरों रत्नो की परख का काम सीखने लगा और एक दिन वह बड़ा पारखी बन गया। लोग दूर-दूर से अपने हीरे की परख कराने आने लगे। एक दिन उसके चाचा ने कहा, बेटा अपनी मां से वह हार लेकर आना और कहना कि अब बाजार बहुत तेज है, उसके अच्छे दाम मिल जाएंगे। मां से हार लेकर उसने परखा तो पाया कि वह तो नकली है। वह उसे घर पर ही छोड़ कर दुकान लौट आया। चाचा ने पूछा- "हार नहीं लाए?" उसने कहा, वह तो नकली था। तब चाचा ने कहा- जब तुम पहली बार हार लेकर आये थे, तब मैं उसे नकली बता ...

बन्दर और बन्दरिया: अच्छा हुआ हम इन्सान नहीं बने - Good We Are Not Human (Heart Touching Story)

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बन्दर और बन्दरिया के विवाह की वर्षगांठ थी। बन्दरिया बड़ी खुश थी। एक नज़र उसने अपने परिवार पर डाली। तीन प्यारे-प्यारे बच्चे, नाज उठाने वाला साथी, हर सुख-दु:ख में साथ देने वाली बन्दरों की टोली। पर फिर भी मन उदास है। सोचने लगी - "काश! मैं भी मनुष्य होती तो कितना अच्छा होता। आज केक काटकर सालगिरह मनाते। दोस्तों के साथ पार्टी करते। हाय! सच में कितना मजा आता। बन्दर ने अपनी बन्दरिया को देखकर तुरन्त भांप लिया कि इसके दिमाग में जरुर कोई ख्याली पुलाव पक रहा है। उसने तुरन्त टोका- "अजी, सुनती हो! ये दिन में सपने देखना बन्द करो। जरा अपने बच्चों को भी देख लो, जाने कहाँ भटक रहे हैं? मैं जा रहा हूँ बस्ती में, कुछ खाने का सामान लेकर आऊँगा तेरे लिए। आज तुम्हें कुछ अच्छा खिलाने का मन कर रहा है मेरा। बन्दरिया बुरा सा मुँह बनाकर अपने बच्चों के पीछे चल दी। जैसे-जैसे सूरज चढ़ रहा था, उसका पारा भी चढ़ रहा था। अच्छे पकवान के विषय में सोचती तो मुँह में पानी आ जाता। "पता नहीं मेरा बन्दर आज मुझे क्या खिलाने वाला है? अभी तक नहीं आया।" जैसे ही उसे अपना बन्दर आता दिखा झट से प...