प्रेम – सत्संग – सुधा – माला
|| श्री हरि: ||
प्रेम – सत्संग – सुधा – माला
पदमपुराण में एक कथा आती है – एक राजकुमार था | उसके मन में आया – कैसे भजन होता है, श्यामसुन्दर का प्रेम क्या वस्तु है, किससे जाकर पूछूँ, कौन बताये ? इसी चिन्ता में वह सो गया | उसके घर में एक ठाकुरजी का विग्रह था | उन्ही के विग्रह के सम्बन्ध में स्वप्न आरम्भ हुआ | स्वप्न में उसने देखा कि वह विग्रह राध-कृष्ण के रूप में बदल गया | वहाँ उसे साक्षात श्रीराधा-कृष्ण दीखने लगे | सखियाँ भी दीखने लगीं | फिर श्रीकृष्ण ने अपनी बायीं ओर बैठी हुई एक सखी से कहा – ‘प्रिये ! इसे अपने समान बना लो |’ वह गोपी आज्ञा पाकर आयी, राजकुमार के पास आकर कड़ी हो गयी तथा अभेद भाव से राजकुमार का चिन्तन करने लगी | राजकुमार ने देखा कि एक क्षण में ही उसके सारे अंग बदल गये; उसके हाथ, पैर, सिर, मुँह, नाक – सब बदल गये और वह एक अत्यन्त सुन्दर गोपी बन गया | उसके बाद उस गोपी ने इसे एक वीणा दे दी कि ‘यह लो, श्यामसुन्दर को भजन सुनाओ |’ उसने भजन सुनाना आरम्भ किया | भजन सुनाने पर श्यामसुन्दर ने प्रसन्न होकर उसका आलिंगन किया, उसे ह्रदय से लगा लिया | इसी समय राजकुमार की नींद खुल गयी | राजकुमार रोने लग गया | निरन्तर एक महीने तक रोता रहा | फिर उसने घर छोड़ दिया और फिर वन में जाकर कई कल्पों तक एक मन्त्र का जप एवं युगल सरकार का ध्यान करता रहा | तब उसे सचमुच गोपी का देह प्राप्त हुआ और उसे भजन सुनाने की वह सेवा मिली |
नारदजी को जब दर्शन हुआ तब एक सखी ने सब सखियों का परिचय दिया कि पूर्व जन्म में वह अमुक ऋषि थे, यह अमुक, इन्होने यह मन्त्र जपा था, यह ध्यान किया था | उसी प्रसंग में नारदजी को उस सखी ने बताया कि जिस सखी के हाथ में वीणा देख रहे हो, वह पहले जन्म में राजकुमार रह चुकी है |
सारांश यह है कि यों तो प्रेम कल्पों की साधना के बाद कभी किसी बडभागी को मिलता है, पर जब वह प्रेम मिलने का उपक्रम होता है, तब एकाएक होता है | उसके लिये कोई साधना है, प्रेम मिल ही जायगा – यह कहना नहीं बनता | हाँ, यह ठीक है कि सच्चे प्रेमियों या संतों का संग अमोघ होता है | वह किसी-न-किसी दिन प्रेम उत्पन्न कर ही देता है |
प्रेम – सत्संग – सुधा – माला
पदमपुराण में एक कथा आती है – एक राजकुमार था | उसके मन में आया – कैसे भजन होता है, श्यामसुन्दर का प्रेम क्या वस्तु है, किससे जाकर पूछूँ, कौन बताये ? इसी चिन्ता में वह सो गया | उसके घर में एक ठाकुरजी का विग्रह था | उन्ही के विग्रह के सम्बन्ध में स्वप्न आरम्भ हुआ | स्वप्न में उसने देखा कि वह विग्रह राध-कृष्ण के रूप में बदल गया | वहाँ उसे साक्षात श्रीराधा-कृष्ण दीखने लगे | सखियाँ भी दीखने लगीं | फिर श्रीकृष्ण ने अपनी बायीं ओर बैठी हुई एक सखी से कहा – ‘प्रिये ! इसे अपने समान बना लो |’ वह गोपी आज्ञा पाकर आयी, राजकुमार के पास आकर कड़ी हो गयी तथा अभेद भाव से राजकुमार का चिन्तन करने लगी | राजकुमार ने देखा कि एक क्षण में ही उसके सारे अंग बदल गये; उसके हाथ, पैर, सिर, मुँह, नाक – सब बदल गये और वह एक अत्यन्त सुन्दर गोपी बन गया | उसके बाद उस गोपी ने इसे एक वीणा दे दी कि ‘यह लो, श्यामसुन्दर को भजन सुनाओ |’ उसने भजन सुनाना आरम्भ किया | भजन सुनाने पर श्यामसुन्दर ने प्रसन्न होकर उसका आलिंगन किया, उसे ह्रदय से लगा लिया | इसी समय राजकुमार की नींद खुल गयी | राजकुमार रोने लग गया | निरन्तर एक महीने तक रोता रहा | फिर उसने घर छोड़ दिया और फिर वन में जाकर कई कल्पों तक एक मन्त्र का जप एवं युगल सरकार का ध्यान करता रहा | तब उसे सचमुच गोपी का देह प्राप्त हुआ और उसे भजन सुनाने की वह सेवा मिली |
नारदजी को जब दर्शन हुआ तब एक सखी ने सब सखियों का परिचय दिया कि पूर्व जन्म में वह अमुक ऋषि थे, यह अमुक, इन्होने यह मन्त्र जपा था, यह ध्यान किया था | उसी प्रसंग में नारदजी को उस सखी ने बताया कि जिस सखी के हाथ में वीणा देख रहे हो, वह पहले जन्म में राजकुमार रह चुकी है |
सारांश यह है कि यों तो प्रेम कल्पों की साधना के बाद कभी किसी बडभागी को मिलता है, पर जब वह प्रेम मिलने का उपक्रम होता है, तब एकाएक होता है | उसके लिये कोई साधना है, प्रेम मिल ही जायगा – यह कहना नहीं बनता | हाँ, यह ठीक है कि सच्चे प्रेमियों या संतों का संग अमोघ होता है | वह किसी-न-किसी दिन प्रेम उत्पन्न कर ही देता है |
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