राधे का ख़त - The Letter of Radha (कृष्ण कथा)
ब्रज से वापिस आते वक़्त जो दशा उद्धव जी की थी, उसे सिर्फ वो ही जान सकता है जिसने या तो उन्हें इस हाल में देखा हो या फिर जिन्हें कृष्णा-भक्ति के नशे का थोडा भी अनुमान है। ब्रज की राज में धुल-धूसित, अंग-वस्त्र के ध्यान से परे राधा नाम रटते उद्धव जी मानो रोम-रोम से ब्रज गोपियों का प्रेम - सन्देश हर मथुरा वासी को सुना रहे थे। कान्हा ने तो आते ही उद्धव जी को गले से लगा लिया मानो पूरे ब्रज को आज अपने आलिंगन में भर लिया हो। उद्धव ने आसुओं से गीला वो पत्र श्री कृष्ण के चरणों में रख दिया जो श्री राधे ने स्वयं अपने हाथों से अपने सांवरे को लिखा था। “कान्हा जी, कान्हा जी.... संभव है, आप तो हमें भूल ही गए होंगे। मथुरा की सुन्दर राजकुमारियों के आगे। वैसे भी ब्रज की ये ग्वालिन कहाँ याद रहने वाली। वैसे भूल तो हम भी आप को गए हैं आप से वादा जो किया था। आपकी मुरली तो हम बिलकुल ही भूल गए केशव, हाँ बस कभी-कभी आपकी तरह पीताम्बर ओढ़ कर ‘कदम’ के नीचे मुरली बजा लेते हैं या सच कहें तो ये संयोग नित्य ही हो जाता है। वैसे तो आपके सर पर सजने वाला मोरमुकुट भी हमें याद नहीं....गोविन्द...हाँ...अपनी...